स्वदेशी – भारत के विकास की एक दिशा
- May 20, 2020
- 6 min read
आजादी के बाद पंडित दीनदयाल ने स्वदेशी को भारत की आत्मा बनाने के लिए अनेको स्तरों पर लोगो के साथ विचार विमर्श किया और स्वदेशी को अपने जीवन दर्शन में अभिभूत कर लिया |

श्रवण बघेल
एकात्म मानववाद और अन्त्योदय विचार के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारत के विकास के लिए एक ऐसा स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मॉडल प्रस्तुत किया जिसके विकास के केंद्र में मनुष्य है । भारत की आज़ादी से पूर्व देश में कई स्वदेशी के जन-आन्दोलन हुए, स्वदेशी को देश का अभिन्न अंग बनाने के लिए कई प्रकार की की नीतियाँ बनायी गयी। आजादी के बाद पंडित दीनदयाल ने स्वदेशी को भारत की आत्मा बनाने के लिए अनेको स्तरों पर लोगो के साथ विचार विमर्श किया और स्वदेशी को अपने जीवन दर्शन में अभिभूत कर लिया | जब हम स्वदेशी का चिंतन करते है तो हमारे मन में स्वदेशी की कल्पना होती है; अपने राष्ट्र का और अपने देश में निर्मित उत्पादित माल | सामान्य शब्दों में किसी भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न, निर्मित या उत्पादित वस्तुओं, नीतियों और विचारों को भी स्वदेशी कहते है | जब देश में आजादी का आन्दोलन चल रहा था तब वर्ष 1905 के बंग-भंग आन्दोलन में स्वदेशी के आन्दोलन को काफी उत्साह मिला, यह आन्दोलन तब वर्ष 1911 तक यह चला। भारत के लोगों में आज़ादी के साथ साथ स्वदेशी के लिए भी श्रृद्धा उत्पन्न हो गयी थी | समसामियक राष्ट्रीय क्रांतिकारी बिपिन चंद्र पाल, अरविन्द घोष, लोकमान्य तिलक और लाला लाजपत राय इस स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य उद्घोषक थे । आगे चलकर यही आन्दोलन सम्पूर्ण देश के स्वतंत्रता आन्दोलन का केंद्र बिंदु बना | महात्मा गाँधी जी ने इसे स्वराज की आत्मा कहा |
मगर स्वदेशी को लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार बहुत ही अलग थे और उस समय स्वदेशी का समाज में प्रचलित अर्थ था विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार और स्वदेश में निर्मित माल का उपयोग | परन्तु पंडित जी स्वदेशी की इस व्याख्या से संतुष्ट नही थे वह स्वदेशी की पूर्ण व्याख्या नही थी | स्वदेशी देश के स्वाभिमान से जुड़ा विषय है | स्वदेशी जहाँ स्वदेशाभिमान में अर्थात् भावनात्मक है, वही वह देश की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी हुई है | दीनदयाल स्वदेश में बनी हुई वस्तु तक ही अपनी दृष्टि को सीमित नही रखते थे | सामाजिक कार्यकर्त्ता बाबासाहेब आप्टे ने दीनदयाल जी के साथ हुए अपने वार्तालाप का संस्मरण अपनी पुस्तक में लिख रखा है | पंडित दीनदयाल ने उनसे कहा था, “मैं उन वस्तुओ को जिनका स्वदेश में निर्माण तो किया जाता है किन्तु उनका सारा लाभ विदेशों को भेज दिया जाता है, स्वदेशी मानने को तैयार नही हूँ |” यह भावना दीनदयाल के मन में स्वदेशनिष्ठा को शत-प्रतिशत ज्वलंत रखती थी | स्वदेशी की परिभाषा को हमे पंडित दीनदयाल के शब्दों में समझना चाहिए। उनकी परिभाषा में स्वदेशी उपभोग की वस्तुओं के साथ भाषा, व्यवहार, वस्त्र के साथ साथ पारंपरिक शिष्टाचार, लोकनीति और लोक व्यव्हार आदि सभी मानव जीवन की महत्वपूर्ण बातों का समावेश था |
पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वदेशी के विषय पर अपने विचार रखते हुए कुछ सवाल रखते थे कि स्वदेशी क्या है? क्या स्वदेशी कोई वस्तु है ? या स्वदेशी कोई मन्त्र है ? इस पर सवालों की और उनके समाधानों की एक निम्नलिखित श्रंखला है –
स्वदेशी कोई वस्तु नही एक चिंतन है |
स्वदेशी भारत के जीवन दर्शन का एक तंत्र है |
स्वदेशी मंत्र है सुखी जीवन का |
आज स्वदेशी एक शस्त्र है युग परिवर्तन का, भारत के विकास का |
स्वदेशी समाधान है भारत की बेरोजगारी का |
स्वदेशी कवच है शोषित होने से बचने का |
स्वदेशी स्वाभिमान है श्रमशीलता का |
स्वदेशी सरंक्षक प्रकृति और पर्यावरण व जीव जन्तुओं का |
आज स्वदेशी एक आन्दोलन है सादगी और सम्मान का |
स्वदेशी आज संग्राम है जीवन और मरण का |
स्वदेशी आधार है समाज की सेवा का |
स्वदेशी उपचार है मानवता के विकास का |
स्वदेशी उत्थान है समाज व राष्ट्र के सम्मान और स्वाभिमान का |
स्वदेशी क्या है ? उ. स्वदेशी देश के स्वाभिमान से जुड़ा विषय है | स्वदेशी वह है जिसे हमे अपनेपन का भाव उत्पन्न हो जाये | जो हमारे इर्दगिर्द उत्पन्न हुआ हो | क्योकि इसके बिना देश में आर्थिक उन्नति तीव्र गति से नहीं हो सकती है |
स्वदेशी कहाँ है ? उ. जो कुछ हमें प्रकृति और अपने राष्ट्र में उपलब्ध हो जाये वहां है स्वदेशी |
स्वदेशी की हमें आवश्यकता कब और कितनी है ? उ. देश के आर्थिक विकास के साथ-साथ, हमें जब सामाजिक सुख और शान्ति मिले तब और जिससे देश की आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये उतनी | उपभोग नहीं उपयोग के भाव तक हमें प्राप्त हो जाए |
स्वदेशी को बढ़ावा कैसे और कब तक ? उ. स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए हमें अपने देश में निर्मित वस्तुओ के उपयोग का संकल्प लेकर उनका उपभोग भी करना होगा | हमे जीवन पर्यंत स्वदेशी के विचारो को आत्मसात करना है |
वैसे जनसंघ था एक राजनैतिक दल, परन्तु दीनदयाल उपाध्याय की प्रखर स्वदेशी वृत्ति की प्रेरणा से उसका गहरा नाता भारतीय संस्कृति और राष्ट्र भक्ति से भी जुड़ा हुआ था | पंडित उपाध्याय कहते थे कि देश की समस्याओं का समाधान पाश्चात्य दर्शन का आधार लेकर नही किया जा सकता है उसके लिए हमे अपने राष्ट्र को ही आत्मनिर्भर बनाना पड़ेगा | यही दीनदयाल का स्वदेशी चिंतन था | उनकी आस्था देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को स्वदेशीनिष्ठा के साथ पूर्ण करने का संकल्प देखते थे | पंडित दीनदयाल ने जब एकात्म मानव दर्शन का प्रतिपादन किया होगा तब भी उनके मन में स्वदेशी की भावना का साकार रूप रहा होगा | पंडित दीनदयाल उपाध्याय का स्वदेशी से भारत के विकास के लिए निम्नलिखित उद्देश्य थे –
भारत की सुरक्षा, एकता को सुनिश्चित करना
एक आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण
भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को बढावा देना
प्राकृतिक संपदा का संरक्षण
सभी क्षेत्रों एवं सभी समाजों का संतुलित विकास
हमें दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को समझने के लिए उनके द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन के विचार को समझना चाहिए | उपाध्याय का चिंतन सदैव भारत के युवा, किसान, मजदूर और देश के सामाजिक और आर्थिक विकास पर केन्द्रित रहा है | उन्होंने सदैव स्वावलंबी और समृद्ध भारत का स्वप्न देखा और उसको साकार करने का मार्ग हम सभी के समक्ष प्रस्तुत किया | हमें यह समझना होगा कि देश में जो भी विकास अभी तक हुआ है, वह वास्तव में स्वदेशी के आधार पर ही हुआ है । स्वदेशी में भाषा, भेष भूषा, भेषज (औषधि), शिक्षा, रीतिरिवाज, भौतिक उपयोग की वस्तुएं, कृषि, लघु व कुटीर उद्योग, व्यवसाय, कार्य कौशल व न्याय व्यवस्था आदि| भारत को अगर हमें सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, विज्ञान, तकनीकी, उत्पादन और सुरक्षा आदि क्षेत्र में समर्थ और शक्तिशाली बनाना है तो हमें स्वदेशी के मूल मन्त्र को अपनाना ही पड़ेगा और कोई दूसरा विकल्प हमारे पास नहीं है| देश की वर्तमान सरकार इस विषय पर प्रशंसापूर्ण कार्य कर रही है |
आज हमारा भारत फिर से स्वावलंबी बन रहा है | आज चिकित्सा के क्षेत्र में हमारा देश विश्व के अग्रणी देशो में से एक है | आज अंतरिक्ष अनुसन्धान के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र जो पूरी तरह से भारतीय प्रौद्योगिकी के आधार पर विकसित हुआ है, उसने सम्पूर्ण विश्व में अपनी कामयाबी को स्थापित कर दिया है । आज विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र भी अपने अंतरिक्ष यानों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने के लिए भारतीय 'पी.एस.एल.वी.' का सहयोग ले रहे है । सामरिक क्षेत्र में परमाणु विस्फोट कर हम पहले ही दुनिया को अचंभित कर चुके है । आज हमारे पास स्वयं का नेवीगेशन नाविक सिस्टम है | हमारे वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीकी से अग्नि प्रक्षेपपास्त्र जैसे कई आयुधो का निर्माण हमारे दुश्मनों दहशत में कर रखा है । सम्पूर्ण विश्व में हमारे देश के वैज्ञानिकों, डाक्टरों और इंजीनियरों ने अपनी योग्यता और योगदान के बल पर अपनी धाक जमा रखी है । भारत की वर्तमान सरकार आयातों पर अपनी निर्भरता कम कर रही है और हमारे निर्यातों में वृद्धि को प्रोत्साहित कर रही है, हमारे सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की अथक मेहनत के कारण हमारे सॉफ्टवेयर के बढ़ते निर्यात देश की इकॉनमी लाभान्वित कर रहे हैं ।
इन सभी क्षेत्रों में हमारी प्रगति किसी भी दृष्टिकोण से विदेशी निवेश और भूमंडलीकरण के कारण नहीं, बल्कि हमारे संसाधनों, हमारे वैज्ञानिकों और उत्कृष्ट मानव संसाधनों के कारण हो रही है । सरकार को अब और ज्यादा स्वदेशी यानी स्वेदशी संसाधन, स्वदेशी प्रौद्योगिकी और स्वदेशी मानव संसाधनों के आधार पर विकास करने को बढ़ावा देना चाहिए । आज जब अमरीका और यूरोप सरीखे सभी देश भयंकर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, तब भारत में स्वदेशी के आधार पर आर्थिक विकास ही एक मात्र विकल्प है ।
भारत के जन के मानस को समझकर ही देश के विकास का मॉडल तय करना चाहिए । एकात्म मानववाद के जनक पं. दीनदयाल उपाध्याय के कतार के अंतिम व्यक्ति की चिंता का मॉडल बनना चाहिए । महात्मा गांधी के रामराज्य की अवधारणा को समझना चाहिए । भारत की नब्ज को पहचान कर, महसूस करके, उसके अनुरूप अब नीतियां बननी चाहिए । भारत में अब एक ऐसा मॉडल बनना चाहिए जिसमें व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य और देश की जरूरतों को ध्यान में रखा जा सके, जिसमें सबके बारे में विचार हो सके । स्वदेशी और सर्वस्पर्शी मॉडल के माध्यम से ही हम विश्व के सामने एक समृद्धिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित हो सकते हैं । हमारे देश में फिर कोई असहाय और मजबूर नहीं होगा | देश स्वाभिमान और स्वावलंबन के साथ आत्मनिर्भर होकर विश्व का मार्गदर्शन करेगा |
(लेखक पीएचडी शोध छात्र हैं और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर शोध कर रहे)



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