संघ, सेवा और प्रेम

सर्वेषां अविरोधेन की भावना से काम कर रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

(via: Twitter)


डॉ आनंद पाटील


‘सामान्य ज्ञान’ वास्तव में ‘विशिष्ट’ ही नहीं, ‘अतिविशिष्ट’ होता है। बहुतांश लोग प्रायः सामान्य ज्ञान को महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं। अतः उसके वैशिष्ट्य एवं हितोपकारी पक्ष (महत्व) से अनजान रह जाते हैं। अधिकतर लोग ‘सामान्य ज्ञान’ वाली परीक्षा में ‘विशेष रूप से’ ‘फेल’ हो जाते हैं क्योंकि वे उस सामान्य का वैशिष्ट्य या तो जानने की ज़रूरत नहीं समझते हैं, या जानने–समझने में भूल ही कर बैठते हैं। यही मामला ‘प्रेम’ के साथ है और ‘संघ’ के साथ भी! ये दोनों ही अपने स्वरूप में ‘सामान्य’ हैं, परंतु इनका ‘वैशिष्ट्य’ अब तक कितनों को समझ आ पाया है?


प्रेम श्रद्धा है। प्रेम भक्ति है। प्रेम करुणा है। प्रेम अहिंसा है। प्रेम सेवा (परोपकार) है। प्रेम कल्याण है। प्रेम समन्वय है। प्रेम समर्पण है। प्रेम आस्था है। प्रेम विश्‍वास है। प्रेम अनुष्ठान है। प्रेम धर्म है। प्रेम (भाव) बोध है। प्रेम चित्त है। प्रेम चिंतन है। प्रेम चिंता है। प्रेम त्याग है। प्रेम संयम है। प्रेम क्षमा है। प्रेम मानवता है। प्रेम जिजीविषा है। प्रेम जीवन है। प्रेम आधार है। प्रेम सत्य है। प्रेम ही शाश्‍वत है। प्रेम के बिना संसार के अस्तित्व की कल्पना की ही नहीं जा सकती। कबीर ने उचित ही कहा है –“जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान। जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान।” कहना न होगा कि संघ की वैचारिकी हर रूप में ‘प्रेम’ का ही यथोक्त वैविध्यपूर्ण विस्तार है और उसके सेवा कार्यों में यह रूप–वैविध्य सहज ही दृष्टिगोचर होता है, बशर्ते कि कोई अपनी आँखों पर पट्टी न बाँधे बैठा हो!


‘कोविड–19’ के इस विकट समय में भी संघ का सेवा कार्य ‘एकांत में आत्म–साधना’ और ‘लोकांत में परोपकार’ की भावना के साथ व्यवस्थित एवं सुनियोजित रूप में चलता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक समय-समय पर कार्यकर्ताओं को सेवा कार्य हेतु दिशा–निर्देश देते हैं। यह बात और है कि आयातित वैचारिकी के मायाजाल में फँसे तथा उसके (दुः)प्रभाव से कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों का मन–मस्तिष्क इस प्रकार कलुषित है कि उन्हें संघ का कोई विचार अच्छा प्रतीत नहीं होता। ऐसा इस कारण भी कि वे ‘प्रेम’ (भाव) को भुला–बिसरा चुके हैं और केवल प्रदर्शन–कामी (कारी?) बन चुके हैं। उनके विचार इतने विस्फोटक हैं कि वे हर बात पर आग उगलते हैं। ऐसा इसलिए भी कि वे कटुता एवं कठोरता की सीमाएँ लाँघ कर ‘कट्टरता’ का दामन थामे हुये हैं। समझदार जानते–समझते हैं कि कट्टरता ‘कठमुल्लापन’ से उपजती है। परंतु ऐसे कठमुल्लापन से ग्रसित तमाम तथाकथित बुद्धिजीवी संघ तथा उसकी वैचारिकी को लांछित करने की मंशा से मौक़े तलाशते हैं और जब कभी मौक़ा मिलता है तो संघ प्रमुख के किसी–न–किसी वाक्य को सुविधानुसार तोड़–मरोड़ कर व्याख्यायित करने का अथक उपक्रम करते हैं। संघ के ‘प्रेम’ दर्शन एवं वैविध्य के बावजूद ट्विटर पर इन दिनों चलाये जा रहे #BanRSS के ट्रेंड में कठमुल्लापन को देखा–समझा जा सकता है।


आज हम ‘न्यू इंडिया’ के डिजिटल समय में जी रहे हैं। लगभग सबके पास ‘स्मार्ट–फोन’ हैं। संघ को लेकर जिनके मन–मस्तिष्क पूर्वाग्रह और दुराग्रहों से लबालब भरे हैं, उन्हें फोन का ‘स्मार्ट’ उपयोग करना चाहिए। पढ़ने में रुचि न हो और टाइप करने की इच्छा न हो तो आजकल के फोन इतने ‘स्मार्ट’ हो चुके हैं कि वे सुनते भी हैं और सुनाते भी हैं। अतः इस समय प्रवाह में आग्रह यह होना चाहिए कि संघ की वैचारिकी जानने–समझने के लिए कम–से–कम सरसंघचालक मोहन भागवत के व्याख्यानों को सुनें। जो भ्रम खड़े किये गये हैं, उनके टूटने से भारत का वर्तमान तो बदलेगा ही, भारत का भविष्य और भविष्य का भारत सुदृढ़ और स्वर्णिम भी होगा। भागवत जी ने ‘भारतीय विचार मंच’ द्वारा 2017 में आयोजित संगोष्ठी समापन में ‘सर्वेषां अविरोधेन दृष्टि’ कायम रखने का आग्रह करते हुए ‘प्रेम’ का ही संदेश दिया था। अर्थात् संघ की वैचारिकी में ‘प्रेम’ वह तत्व है, जो उसे केवल स्थायित्व ही नहीं देता अपितु विशिष्ट अर्थों में शाश्‍वत बनाता है। संघ का ‘प्रेम’ नित्य नूतन भी है और चिर पुरातन भी। अर्थात् वह अपनी (देशीय) भाव–भूमि से जोड़े रखने में कारगर है।


आनन–फानन जो संघ की आलोचना करते हैं, उन्हें स्मरण कराने की आवश्यकता है कि न तो संघ सरकार से कोई मानपत्र प्राप्त करने के लिए लालायित रहा है, न संघानुयायी कार्यकर्ता किसी प्रमाणपत्र, मानदेय एवं यात्रा भत्ता के लिए ही कार्यरत हैं।

वे न पुरस्कार–कामी हैं, न ही ‘एवार्ड वापसी गैंग’ की तरह कुटिल खल कामी। वे संपूर्ण भारतवासियों की सेवा को न केवल अपना परम धर्म मानते, अपितु राष्ट्रोत्थान के लिए सतत अथक कार्यरत हैं। ‘संघ का समाज इस देश की संपूर्ण जनता है’सर्वेषां अविरोधेन! संघ के लिए सेवा ‘आत्मीय वृत्ति का परिपाक’ है और उसके लिए आत्म–प्रकाशन हेय है। ‘कोविड–19’ के दौरान सेवारत कार्यकर्ताओं को भागवत जी ने संघ के इसी पाठ का पुनः स्मरण कराया है। ऐसा करते हुए ‘एकांत में आत्म–साधना’ और ‘लोकांत में परोपकार’ वाले संघ के कार्य–स्वरूप को भी उन्होंने रेखांकित किया है। उनका एक वक्तव्य उल्लेखनीय एवं अनुकरणीय है – “सातत्य अपने प्रयासों में चलना चाहिए। ऊबना नहीं चाहिए, थकना नहीं चाहिए। करते रहना चाहिए। सबके लिए करना है। इसमें कोई भेद नहीं है। जो इसके पीड़ित हैं वो हमारे अपने हैं।”


वर्तमान स्थितियाँ ऐसी हैं, जहाँ संघ के अतिरिक्त कहीं कोई बुद्ध (बुद्धिमान) दूर–दूर तक दिखाई नहीं देता है और जो स्वनामधन्य हैं, वे धर्म (राष्ट्रीय दायित्व) जानने–समझने के पक्ष में नहीं हैं। आयातित वैचारिकी की कौंध में जो कुछ जान–समझ पाये हैं, वास्तव में वह ‘नीम हक़ीम ख़तरे जान’ से अधिक कुछ नहीं है। अतः उससे उपजी बौद्धिक खुजलाहट से भारत का भविष्य सँवरेगा नहीं।आज राष्ट्रवादी विमर्श को समझना और उससे जुड़कर समस्याओं का सामाधान खोजना ही एक मात्र विक्लप जान पड़ता है।

(लेखक हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं)


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