सर्व शिक्षा अभियान अब सिर्फ प्राथमिक शिक्षा तक सीमित नहीं

राजीव प्रताप सिंह, पीएचडी, पत्रकारिता विभाग

गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर


आर्थिक पैकेज का ऐलान करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ‘ई-विद्या’ नामक व्यापक पहल की घोषणा की। आज सम्पूर्ण विश्व एक ऐसी महामारी के दौर से गुजर रहा है, जिसने मानव जीवन पद्धति को परिवर्तित कर दिया है। स्पष्ट है कि इसका प्रभाव शिक्षा जगत पर भी व्यापक रूप से देखने को मिलेगा। सरकार की यह पहल भी शिक्षा जगत में आने वाले उसी परिवर्तन का परिणाम है। अनेक शिक्षाविदों का मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में जो तकनीकी परिवर्तन दशकों बाद होने वाले थे, कोरोना महामारी के कारण वे परिवर्तन हम आज ही देख सकते है।


इन दिनों तकनीकी पर हमारी निर्भरता बढ़ी है। सरकार के ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे नीतिगत उपायों के कारण हम इस मुश्किल समय में भी कुछ सकारात्मक एवं रचनात्मक गतिविधियां करने का प्रयास कर रहे है। चाहे वह पीएमआरएफ़ में बढ़ चढ़ कर सहयोग की बात हो या लॉक डाउन के दौरान हम देख रहे है कि अनेक वेब गोष्ठी आयोजनों की बात हो। यह सब डिजिटल इंडिया जैसे नीतिगत उपायों से संभव हो सका है। ज्ञान के इस प्रवाह को ढांचागत तरीके से सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने ई-विद्या योजना की शुरुआत की है।

ई-विद्या योजना के अंतर्गत देश के शीर्ष 100 विश्वविद्यालय 30 मई, 2020 से ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू कर सकेंगे। इस योजना के माध्यम से दृष्टि बाधित व श्रवण बाधित बच्चों के लिए ई-सामग्री तैयार करने की बात कही गई है। इसके अतिरिक्त रेडियो और सामुदायिक रेडियो के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। पहली से बारहवी तक की प्रत्येक कक्षाओं के लिए अलग अलग टीवी चैनल बनाए जाएँगे। पहली से बारहवी तक की सभी कक्षाओं के लिए ई-सामग्री और क्युआर कोड के रूप में पाठ्य पुस्तकें ‘दीक्षा’ नामक डिजिटल प्लेटफार्म से आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी। विद्यालयों में 21वीं सदी के अनुकूल शिक्षण पद्धतियों और पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही ई-पाठशाला में 200 नई पाठ्य पुस्तकें जोड़ी जाएंगी एवं बच्चों और अध्यापकों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं के समाधान के लिए ‘मनोदर्पण’ भी लाया जाएगा।



तकनीकी के इस आधुनिक युग में आकर्षक इंटरफेस के कारण प्रत्येक व्यक्ति आसानी से आधुनिक गैजेट्स इत्यादि का प्रयोग कर रहा है। विशेषतः बच्चों एवं युवाओं में इस नई तकनीकी और नए गैजेट्स को लेकर बहुत आकर्षण है। यदि उनको उन्हीं के मनचाहे प्लेटफार्म के माध्यम से अध्ययन में शामिल कराने का प्रयास किया जाएगा तो वे अपेक्षाकृत अधिक तन्मयता के साथ इस सकारात्मक प्रयास में सहभागिता सुनिश्चित करेंगे। ई-विद्या की इन योजनाओं के द्वारा सूदूर में बैठा वह व्यक्ति भी लाभान्वित हो सकेगा, जहाँ इन्टरनेट की उपलब्धता नहीं है। जिन सूदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इन्टरनेट की पहुचं नहीं है या जो अभिभावक आर्थिक रूप से कमजोर है और इन्टरनेट का सब्सक्रिप्शन नहीं ले सकते हैं, उन अभिभावकों के बच्चे भी इस योजना के माध्यम से स्वयंप्रभा पर प्रसारित चैनल को देखकर शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। कुछ असामाजिक तत्वों के कारण विद्यालय या विश्वविद्यालय जाने वाली बच्चियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता था, लेकिन इस योजना के माध्यम से उन बच्चियों को प्रोत्साहन मिलेगा और वे घर बैठे भी शिक्षा प्राप्त कर सकेंगी।


आज भी अनेक क्षेत्रों में जहाँ बच्चियों को पढने के लिए घर से बाहर नहीं भेजा जाता है, वे बच्चियां भी ई-विद्या के माध्यम से ऑनलाइन पाठ्यक्रम, स्वयंप्रभा चैनल या डिजिटल प्लेटफार्म से शिक्षा प्राप्त कर सकेंगी। इसके अतिरिक्त आज भारत में उच्च शिक्षा दर अत्यंत कम है। ई-विद्या योजना के द्वारा शीर्ष 100 विश्वविद्यालय ऑनलाइन पाठ्यक्रम प्रारंभ कर सकेंगे। इससे वे बच्चे या बच्चियां जो सामाजिक आर्थिक परिवेश के करण उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं ले सकते थे, वे भी अब उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। भारत में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के बच्चे देश के बड़े शहरों में स्थित प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्ययन नहीं कर सकते थे। लेकिन इस योजना के माध्यम से अब वे भी देश के शीर्षस्थ संस्थानों में अध्ययन कर सकेंगे। भारत के अनेक दूर दराज के गाँव के अनेक बच्चों को बहुत दूर यात्रा करके विद्यालय या विश्वविद्यालय जाना पड़ता था। अब उनकी यह समस्या भी समाप्त हो जाएगी क्योंकि इस योजना के माध्यम से वे घर बैठे ही शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। इससे भारत में उच्च शिक्षा दर भी बढेगा।


कुछ लोगों का मानना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यदि हम ऑनलाइन शिक्षा का वैश्विक परिदृश्य देखें तो हम पाएँगे कि विश्व के अनेक देश बहुत पहले से ही ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली पर काम कर रहे है। आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि विश्व में अनेक विश्वविद्यालय जो साइबर विश्वविद्यालय के रूप में काम कर रहे है। विश्व का सबसे प्रतिष्ठित तकनीक संस्थान एमआईटी ने 2001 में ही ओपन कोर्सवेयर नाम से अपने छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षा का डिजिटल प्लेटफार्म उपलब्ध करा रहा है। विश्व में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाला प्रतिष्ठित संस्था आर्गेनाइजेशन फॉर इकनोमिक ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट 2005 से ही ऑनलाइन शिक्षण प्रक्रिया को कैसे आम आदमी तक पहुचाया जाए, इसके लिए काम कर रहा है। अब उन्होंने ओपन एजुकेशनल रिसोर्सेस नाम से ई-एजुकेशन का प्लेटफार्म भी बना लिया है। यूनेस्को 2002 से ही ई- एजुकेशन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास कर रहा है। चीन 2003 से ही CORE (चाइना ओपन रिसोर्स फॉर एजुकेशन) पर काम कर रहा है। इस तरह विश्व के अनेक प्रतिष्ठित संसथान ई-एजुकेशन के लिए लिए प्रयासरत है।


ई-एजुकेशन में संसाधनों की कमी को लेकर प्रश्न-चिन्ह लगाया जा रहा है। सरकार ने ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के लिए किसी भी संस्थान को नहीं अपितु जो विश्वविद्यालय एनआईआरएफ़ (NIRF) की रैंकिंग में शीर्ष 100 में स्थान रखते है उन्हीं को 30 मई, 2020 तक ऑनलाइन पाठ्यक्रम प्रारंभ करने की अनुमति भारत सरकार ने दी है। स्पष्ट है कि इन शीर्ष संस्थानों में देश के अनेक प्रतिष्ठित संस्थान ही होंगे जो एनआईआरएफ द्वारा जारी शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों की सूची में जगह बना पाए होंगे। इन संस्थानों के पास संसाधनों की कमी तो नहीं ही होगी, इसके साथ ही इन संस्थानों में देश के अनेक शीर्षस्थ विषय विद्वान भी उपलब्ध होंगे जिससे वे शिक्षा जगत को उच्च गुणवत्ता की सामग्री उपलब्ध करा सकेंगे।


सरकार की यह योजना भी एक दिन का परिणाम नहीं है अपितु इस दिशा में सरकार वर्षों से काम कर रही थी। एक राष्ट्र, एक शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाते हुए 2015 के अंत में मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने ई-पीजी पाठशाला की शुरुवात की थी। इसके द्वारा ऑनलाइन मुफ्त पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की लिए टेक्स्ट के साथ-साथ विडियो सामग्री भी उपलब्ध करने के काम किया जाना था। आज इनफ्लिबनेट पर उपलब्ध इस प्लेटफार्म पर 3200 से ज्यादा विशेषज्ञों के द्वारा 19000 से ज्यादा विडियो लेक्चर उपलब्ध है। इन विशेषज्ञों में राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, एम्स तथा अनेक केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के प्रतिष्ठित विद्वान सम्मिलित है। पिछले दिनों यूजीसी ने कहा था कि सीबीसीएस सिस्टम के अंतर्गत 100 क्रेडिट में से 20 क्रेडिट मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। सरकार इसे 40 प्रतिशत तक बढाने पर भी विचार कर रही है।


इस ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी समस्या परीक्षा की है। सरकार को इस पर जरुर गहन विचार करने की आवश्यकता है। एक और महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि यदि हम वैश्विक तौर पर देखें तो अनेक देशों में सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा शिक्षा से आता है। यदि भारत में भी ई-लर्निंग को मूर्त रूप दिया जाएगा, तो निश्चित रूप से भारत को राजस्व के क्षेत्र में भी बड़ा लाभ हो सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे बच्चों के संस्कारों में कमी आएगी। ये बिलकुल सच है कि ई-लर्निंग फेस टू फेस टीचिंग का विकल्प नहीं हो सकता है। वही यह भी सच है कि क्लासरूम टीचिंग में भी अध्यापक ई-लर्निंग का प्रयोग करते है और अनेक शिक्षा शास्त्रीय शोध में भी यह पाया गया है कि ऑडियो विजुअल माध्यम के द्वारा बच्चे कक्षा में अधिक ध्यान लगा पते है। संकट की ऐसी घड़ी से निपटने के लिए और हाशिये के लोग, जो बड़े शहरों के अच्छे संस्थानों में जाकर शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकते है, उनको मुख्यधारा में शामिल करने के लिए इस तरह के प्रयास किये जाने चाहिए। जहाँ तक संस्कारों की बात है तो 20 प्रतिशत क्रेडिट ही MOOC (मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स) के द्वारा प्राप्त किये जा सकते है जबकि अन्य 80 प्रतिशत जो क्लासरूम अधिगम से प्राप्त किया जा सकता है उसमें हम नैतिक शिक्षा के गुर सिखा सकते है।

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