राष्ट्रीय शिक्षा नीति: कोर्स चयन के विकल्पों में लचीलेपन के माध्यम से विद्यार्थियों का सशक्तिकरण

Updated: Aug 13

नई शिक्षा नीति के तहत स्नातक पाठ्यक्रम में महत्त्वपूर्ण सुधार किया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा।



बेबी तबस्सुम

उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण के दौर में संपूर्ण विश्व जुड़-सा गया है। इस अंतर्निर्भरता वाले विश्व ने वीयूसीए (Volatile Uncertain Complex and Ambiguous) के उद्भव में अहम भूमिका अदा की है। जो नेतृत्व क्षमता से युक्त मानव संसाधनों के विकास पर बल देता है। बाज़ारीकृत अर्थव्यवस्था से यह मांग आने लगी कि शैक्षिक गलियारों में सिद्धांत आधारित और परीक्षोन्मुखी अधिगम का टिके रहना मुश्किल है। बाजार को वह विद्यार्थी चाहिए जो चिंतनशील और समस्या का समाधान करने वाला, व्यावसायिक और संवाद कौशलों, निर्णय शक्ति और नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों में पारंगत हो। डेलर्स आयोग (1996) ने इस तथ्य को उजागर किया है कि 21वीं शताब्दी में संसार के अधिकतर देशों में औद्योगिक व्यवस्था होगी। इस भूमंडलीकृत विश्व में राष्ट्रों की अंतर्निर्भरता बढ़ेगी। अत: आवश्यक है कि विद्यार्थी को प्रारंभ से ही इन सभी कौशलों में प्रशिक्षित किया जाए। आयोग ने अपने प्रतिवेदन 'सीखना : आतंरिक खज़ाना' में शिक्षा को चार आधारों- जानना सीखना, करना सीखना, बनना सीखना और एक साथ रहना सीखना में वर्गीकृत किया। इसी परिप्रेक्ष्य में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) को बनाया जा रहा था तब किसी को अंदाजा नहीं था कि दुनिया कोविड-19 जैसी खतरनाक महामारी की चपेट में आ जाएगी इस महामारी के आगमन ने संपूर्ण दुनिया के समक्ष सोचना, सीखना, काम करना और जीवन जीना जैसी शिक्षा पद्द्ति की आवश्यकता को सामने लाकर खड़ा कर दिया है


इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु 21वीं सदी की शिक्षा के लक्ष्यों व आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने हेतु, शिक्षण प्रक्रिया को शिक्षार्थी-केंद्रित, जिज्ञासा, खोज, अनुभव और संवाद पर आधारित बनाने हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) आखिरकार काफी चर्चा-विमर्श के बाद जनता के समक्ष पेश की गई। यह नीति विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ाने हेतु रचनात्मकता, तार्किक सोच, प्रयोग व खोज आधारित शिक्षा पद्धति पर जोर देती है। साथ ही कई आमूलचूल परिवर्तनों की ओर लेकर जाती है। इस नवीन नीति में विद्यार्थी को अपने विषय चयन करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। कोर्स चयन में विकल्प के माध्यम से छात्र अपनी रूचि व क्षमतानुसार विषय का चयन करके अपने कौशलों में निपुणता हासिल कर सकेंगे। अधिगम (लर्निंग) पर किया गया शोध बताता है कि जब हम विद्यार्थी को चुनाव का विकल्प देते है तब वह ज्यादा सीखते है, अपनी प्रतिभा व कौशलों को विकसित कर पाते हैं। इससे उसकी जिज्ञासा, रूचि और छिपी हुई प्रतिभा बाहर आती है, उसका सर्वागीण विकास होता है। स्टारवक इंस्टीटूशन ऑफ एजुकेशन (वाशिगंटन) के विशेषज्ञ जिम बेंटले का मानना है कि शिक्षार्थी की चयन की स्वतंत्रता शिक्षकों की स्थिति को पुन:परिभाषित करके उसे ज्ञान प्राधिकार से सीखने की मार्गदर्शिका पर भी लाती है।


इसके अतिरिक्त नीति में स्ट्रीम की अवधारणा को समाप्त करना अपने आप में सराहनीय कदम है। इसमें 'पाठ्यक्रम', 'अतिरिक्त-पाठ्यक्रम' या 'सह-पाठ्यक्रम', 'कला', 'मानविकी', और 'विज्ञान', अथवा 'व्यावसायिक' या 'अकादमिक' धारा जैसी श्रेणियों को खत्म करने की बात कही गयी है। विद्यार्थी किसी भी विषय को चुन सकते हैं, सभी विषय समान है। हालाँकि कुछ अनिवार्य विषय जैसे शारीरिक शिक्षा, लिबरल आर्ट्स आदि को पढ़ना जरुरी है ताकि वह एक जिम्मेदार नागरिक बन सके। व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ नैतिकता, करुणा, संवेदनशीलता, संस्कृति व चरित्र निर्माण मूल्यों का समावेश करने पर जोर दिया गया है। अब हम समझ चुके है कि अपने विषय से बाहर जाकर सभी विषयों की अंतर्संबद्धता देखने में ही समाधान मिलेगा। किसी भी समस्या का समाधान मात्र एक विषय में नहीं हैं। उदाहरण के लिए- कोविड-19 का समाधान केवल मेडिकल जगत में ही नहीं है, समाजशस्त्र, राजनीती विज्ञान आदि विषयों में भी है। साथ ही बोर्ड परीक्षा में दिया गया लचीलापन ज्यादा अधिकारों को प्राप्त करने की संभावना को बढ़ाते हैं जो कि शिक्षा व्यवस्था में लोकतांत्रिक वातावरण प्रदान करता है। इंटर्नशिप, आवश्यक ज्ञान प्राप्ति एवं अपरिहार्य चिंतन को बढ़ाने व अनुभवनात्मक शिक्षण पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए पाठ्यक्रम को कम करने पर बल दिया गया है। कल्पनाशील और लचीली पाठ्यक्रम संरचनाएं अध्ययन के लिए विषयों के रचनात्मक संयोजन को सक्षम करेंगी। यह सभी प्रावधान विद्यार्थियों को सशक्त बनाते हैं। सशक्तिकरण के माध्यम से नवाचार और आउट-ऑफ-द-बॉक्स विचारों को प्रोत्साहन मिलेगा।


नई शिक्षा नीति (2020) के तहत स्नातक पाठ्यक्रम में महत्त्वपूर्ण सुधार किया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा। जैसे- 1 वर्ष के बाद प्रमाण-पत्र, 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा 3 वर्षों के बाद डिग्री तथा 4 वर्षों के बाद शोध के साथ स्नातक। विद्यार्थियों के लिए कई प्रवेश और निकास के विकल्प से वह ज्यादा प्रभावी तरीके से सीख सकते हैं। इसके साथ ही विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने के लिए 'एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट' दिया जाएगा, जिससे अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें डिग्री प्रदान की जा सके। नई शिक्षा नीति में एमफिल कोर्सेज को ख़त्म करने को बड़ा बदलाव माना जा रहा है यह नीति लागू होने के बाद 4 साल का ग्रेजुएशन डिग्री प्रोग्राम फिर मास्टर्स के बाद सीधा पीएचडी कर सकते हैं। इस तरह लचीलेपन के माध्यम से विद्यार्थियों में उनके सीखने के तौर-तरीकों और कार्यक्रमों को चुनने की क्षमता विकसित होगी वे अपनी प्रतिभा और रुचियों के अनुसार जीवन में अपना रास्ता चुन सकेंगे।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति की कड़ी आलोचना यह कहकर की जा रही है कि यह आदर्शवादी दस्तावेज़ है। जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन का रास्ता चुनौतियों से भरा हुआ है। इसके साथ ही यह केवल नीति है कानून नहीं है सरकार का यह दिशानिर्देश है। इसको प्रभावी बनाने के लिए आपको अलग-अलग कानून बनाने पड़ेंगे। उदाहरण के लिए- यूपीए सरकार की नीति 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009)' को वैधानिक रुपरेखा में तैयार किया गया था। जिसने सार्वभौमिक प्रारंभिक शिक्षा सुलभ कराने हेतु कानूनी आधार उपलब्ध करवाया। इसके साथ ही हमें यह समझना चाहिए कि शिक्षा समवर्ती सूची (42 वें संशोधन, 1976) का विषय है । राज्य और केंद्र दोनों इस पर अपने-अपने कानून बना सकते है। तथ्य यह बताते है कि देश में केंद्र की बजाय ज्यादातर राज्य विश्वविद्यालय (411) है। क्या इसे लागू करने को लेकर राज्यों की तरफ से सहमति बन पायेगी?


इस नीति में विद्यार्थियों को अपना विषय चुनने की आज़ादी प्रदान की गयी है। वहीं हम यह भूल गए है कि हमारा समाज पितृसत्तात्मक हैं। क्या ऐसे वातावरण में वह तटस्थ होकर अपना निर्णय ले पायेगा? मौजूदा व्यवस्था में वाणिज्यिक और विज्ञान जैसे विषयों का प्रभुत्व समाज में कायम है। वहीं ब्यूटी, शारीरिक शिक्षा, कला और शिल्प जैसे विषयों के प्रति विद्यार्थियों का नजरिया है कि समाज में इनकी हैसियत और महत्त्व कम है, जैसे पूर्वाग्रहों से ग्रसित है, तो क्या ऐसे में वह तटस्थ होकर विषय का चयन कर पाएंगे? महज़ नीति लाने से यह भेद मिटने वाला नहीं है। क्या समाज मानसिक परिवर्तन के लिए तैयार है?


इन खामियों के बावजूद इसकी उपलब्धियों को कमतर नहीं आंका जा सकता है। इसमें शिक्षा की पहुँच, समानता, गुणवत्ता, वहनीय शिक्षा और उत्तरदायित्व जैसे पर विशेष ध्यान दिया गया है। तकनीकी शिक्षा, भाषाई बाध्यताओं को दूर करने, दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा को सुगम बनाने की बात कही गई है। उच्च शिक्षण संस्थानों में 'सकल नामांकन अनुपात' को 26.3% से बढ़ाकर 50% तक करने का लक्ष्य रखा गया है। यह जो विश्वविद्यालयों में क्रेडिट ट्रांसफर करने की बात की गई है वह छात्रों को अपना सर्वश्रेष्ठ विकल्प खोजने की सच्ची स्वतंत्रता देता है। भविष्य में आशा जताते है कि यह अपने पूर्ण रूप में भले ही न हो परंतु कुछ अंशों में क्रियान्वित होकर शिक्षा व्यवस्था को प्रगति की ओर लेकर जायेगा।


इस नीति को कागज़ से जमीनी स्तर पर लाने के लिए रणनीति बनानी होगी। रणनीति को पूरा करने के लिए रोडमैप तैयार करना होगा। तत्पश्चात मौजूदा संसाधनों का आकलन करना होगा। उसके पश्चात् सभी में समन्वय बैठाकर क्रियान्वयन की तरफ बढ़ना होगा। जिसके लिए सभी को संकल्पबद्ध होकर काम करना होगा। समाज, राज्य, विद्यार्थी, शिक्षक, विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थाएं सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। हमारे अथक प्रयासों से इस शताब्दी को शिक्षा के क्षेत्र में एक नई दिशा मिल सकती है।


(Baby Tabassum is an Intern with Acdemics4Nation. She is currently doing MPhil from Delhi University.)


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