राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय भाषा का महत्व

Updated: Aug 13

स्थानीय भाषा को शिक्षा माध्यम में शामिल करने से धूमिल या विलुप्त हो रही भाषाओं को नवीन पहचान एवं समृद्धि मिलेगी साथ हीं देश के बौद्धिक संपदा भी समृद्ध होगी



चंद्रशेखर शर्मा

डॉ के. कस्तूरीरंगन के अध्यक्षता में आज़ाद भारत की तीसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर कैबिनेट का मुहर लगते ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था के आगामी परिणाम प्रथम दृष्टया में सकारात्मक ही मालूम होता है। इस नीति में घोषित विभिन्न नवीन घोषणाओं में सबसे महत्वपूर्ण एवं स्थानीय स्तर पर ज्यादा असरकारक मातृभाषा में शिक्षा को प्रदान करना ही है। ऐसा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में ज्ञानार्जन किसी भी अन्य भाषा की तुलना में ज़्यादा प्रभावी एवं दूरगामी होते हैं।

भाषा किसी भी व्यक्ति,स्थान,समाज आदि के उत्थान के लिए अतिआवश्यक सामग्री है।भाषा के माध्यम से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं किसी स्थान या समाज के साहित्य और संस्कृति की पहचान होती है।यह भाषा ही है जो किसी मनुष्य के सोचने-विचारने का माध्यम है।भारत जैसे बहुभाषिक देश के लिए जहां आज़ादी के बाद राज्यों का पुनर्गठन भी भाषाई आधार पर किया गया है ऐसी स्थिति में स्थानीय भाषा में शिक्षण लाभदायक सिद्ध होगा। भारत जैसे बहुभाषीय देश में यह देखने लायक होगा कि जहाँ कुछ हीं दूरी पर भाषा या बोली की विभिन्नताएँ विद्यमान है वहां यह नीति कितनी असरकारक होगी। लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद यदि इस नीति को जमीनी स्तर पर यथाप्रस्तावित लागू कर दिया जाएं तो परिणाम शतप्रतिशत सकारात्मक एवं दुरगामी प्रभाव वाले सिद्ध होंगे।


मातृभाषा में प्राथमिक स्तर पर शिक्षा देने से पहले मातृभाषा में पुस्तकों की उपलब्धि प्रथमतः महत्वपूर्ण होगी। अब सवाल यह उRपन्न होता है कि आखिर इस देश में सैकड़ों मातृभाषाएं मौजूद हैं तो उनमें से कितनी भाषाओं को मानक मkन कर पाठ्यक्रम तैयार हो क्योंकि इतनी भाषाओं में पुस्तक को तैयार करना चुनौती भरा होगा।अगर हम पुस्तकों को तैयार करने में सफल हो भी जाते हैं तो दूसरी चुनौती के रूप में हमे यह देखना होगा कि हमारे पास सभी भाषाओं के प्राथमिक स्तर पर कितने संख्या में अध्यापक मौजूद है। 2017 की डेटा के अनुसार सरकारी विद्यालयों में प्राथमिक स्तर पर 37 विद्यार्थियों पर एक अध्यापक की उपस्तिथि थी। डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (डीआईएसई) के सर्वेक्षण के अनुसार सरकारी विद्यालयों में dsoy 44.88% अप्रशिक्षित अध्यापकों की संख्या थी।

इन सब के बावजूद कितने प्रतिशत शिक्षक हमारे पास ऐसे हैं जो विभिन्न मातृभाषा में शिक्षण करने के सुयोग्य हैं यदि संख्या पर्याप्त हुई तो यह फायदेमंद होगा लेकिन यदि स्तिथि इसके अनुरूप नही हुई तो फिर से शिक्षकों को मातृभाषा में प्रशिक्षण देना अनिवार्य होगा।इस प्रशिक्षण के पश्चात कोई भी अध्यापक प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण को ज़्यादा प्रभावी और हितकारी बना सकेगा। क्योंकि किसी ग़ैरभाषा में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों से मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों ने पाठ्य को ज़्यादा आसानी से सीखा एवं ज्यादा समय तक याद भी रखा।मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने से बच्चे केवल जल्दी सीखते ही नही हैं बल्कि स्थानीय साहित्य एवं संस्कृति को भी सुचारु रूप से ग्रहण करते हैं।


स्थानीय भाषा को शिक्षा माध्यम में शामिल करने से धूमिल या विलुप्त हो रही भाषाओं को नवीन पहचान एवं समृद्धि मिलेगी साथ हीं देश के बौद्धिक संपदा भी समृद्ध होगी। जहाँ विश्व स्तर पर 10% भाषाएँ अतिसंवेदनशील एवं 10% भाषाएं लुप्तप्राय है वहीं भारत में सन 1950 से अबतक 5 भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं वहीं 42भाषाएँ अतिसंवेदनशील स्तिथि में हैं।


1921 में 'यंग इण्डिया' में प्रकाशित अपने एक लेख में गांधीजी ने कहा था कि 'राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा है।' एवं प्रत्येक व्यक्ति अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करे,उसमे कार्य करे किन्तु देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा भी वह सीखे।इनका मानना था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नही ले सकती। सिलौन के माहिंद कॉलेज, गेले में 24 नवंबर 1927 को भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा ग्रहण करते हैं,वो आत्महत्या करते हैं।यह उन्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करती है।वह उनके सारी मौलिकता का नाश कर देती है।उनका विकास रुक जाता है।इसलिए मैं इस चीज को पहले दर्ज़े का राष्ट्रीय संकट मानता हूँ। उनका मानना था कि मातृभाषा में शिक्षा हो तो भारत में नकलची नमूने नहीं,करोडों वैज्ञानिक और दार्शनिक पैदा होंगे।


विश्व के समृद्धशाली एवं विकसित देशों में प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम वहाँ की स्थानीय भाषा हीं है।चीन में मैंडरिन,फ्रांस में फ्रेंच,जापान में जापानी,इंग्लैंड में अंग्रेजी, रूस में रूसी भाषा में हीं शिक्षा दी जाती है अँग्रेज़ी को केवल विषय के रूप में हीं पढ़ाया जाता है माध्यम के तौर पर नहीं।इसी का परिणाम रहा कि इन देशों से निरंतर नवीन दर्शन,समृद्धशाली साहित्य एवं विज्ञान,अनेकों विश्वस्तरीय खोज आदि होते रहें हैं।एक भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी को सीखने पर कोई रोक नही है क्योंकि किसी भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए अनेक भाषाओं में ज्ञानार्जन महत्वपूर्ण होता है लेकिन अपनी स्थानीय भाषा को साथ लेकर। तथापि जब हम इस संदर्भ में भारत की बात करते हैं तो हमें सबसे पहले 1835 ईस्वी में मैकाले द्वारा तैयार शिक्षा को ध्यान में रखना होगा जिसका एकमात्र उद्देश्य अंग्रेजों के लिए कम पैसे में काम करने वाले कर्मचारी वर्ग को तैयार करना था न कि भारतीय साहित्य एवं संस्कृति को समृद्धि प्रदान करने हेतु चिंतक और विद्वान तैयार करने थे।


यह गौरतलब है कि हर कुछ वर्षों के बाद नई शिक्षा नीति की आवश्यता पड़ती है या पुरानी शिक्षा नीति में संशोधन महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत में भी मौजूदा शिक्षा नीति अनेक पहलुओं पर खरी नही उतर सकी जिसकी उम्मीद की गई थी। जिसमे अंको को ज़्यादा महत्व देना जिससे शिक्षार्थियों में ज्ञान की जगह अंक पाने की होड़ सी हो गयी साथ हीं तकनीकी आधारित शिक्षा का आभाव होना जो इस वैश्विक महामारी के समय शिक्षा जगत की लचर व्यवस्था को उदघाटित करती है।


इन सभी तथ्यों और संदर्भो के माध्यम से कहा जा सकता है कि कुछ कठिनाईयों के बावजूद निश्चित तौर पर नई शिक्षा नीति को सकारात्मक रूप से लागू करने पर एवं प्राथमिकक स्तर पर स्थानीय भाषा को माध्यम बनाने से देश की साहित्य,संस्कृति,नवाचार एवं बौद्धिक संपदा में अप्रत्याशित वृद्धि होगी।

(Chandrashekhar Sharma is an Intern with Academics4Nation. He is currently pursuing MA from Delhi University)

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