राष्ट्र निर्माण के नायक - डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

स्वावलंबन व स्वदेशी के मार्ग पर चलकर औद्योगिक नीति में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वस्त्र उद्योग के व्यापक विस्तार की योजना को मूर्त रूप दिया । उसी का यह प्रतिफल है की भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में आज वस्त्र उद्योग की सबसे बड़े उद्योगों में गिनती होती है।



Shyama Prasad Mukherjee's portrait in the Parliament.



डाॅ कुलवीर सिंह चौहान

स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले 'आजादी के अमृत महोत्सव' के पूर्व मनाए जा रहे कार्यक्रमों के बीच स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्र नायकों का पुण्य स्मरण हमें अपनी विरासत पर गर्व करने का अवसर प्रदान करता है। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रनायकों में से एक हैं। 6 जुलाई 1901(विक्रम संवत १९५८,श्रावण मास,कृष्ण पक्ष पंचमी ,दिन शनिवार ) को,यशस्वी माता-पिता श्रीमती योगमाया देवी एवं श्री आशुतोष मुखर्जी के पुत्र के रुप में जन्मे श्यामा प्रसाद,को अपनी वंश परंपरा से आध्यात्मिक और अकादमिक अभिरुचि के संस्कार प्राप्त थे। दादा गंगा प्रसाद मुखर्जी के साहित्यिक गुणों व गणितज्ञ पिता सर आशुतोष मुखर्जी के अकादमिक गुणों का श्यामा प्रसाद में अद्भुत समन्वय था।


उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद मात्र 24 वर्ष की अवस्था में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय की सीनेट के फैलो बनाए गए थे।1934-38 के अवधि में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा (33 वर्ष की अवस्था) और सफल कुलपति होने का गौरव भी उन्होंने प्राप्त किया। इसके पहले 1929 व 1937 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए। 1939 में विनायक दामोदर सावरकर की प्रेरणा से हिन्दू महासभा में शामिल हुए तथा 1941 से 1947 तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहते हुए हिन्दूओं को संगठित करने का बीड़ा उठाया। 1946 में वह संविधान सभा के सदस्य बने। गांधीजी के कहने पर उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य बनाया गया लेकिन हिन्दू हितों की अनदेखी के कारण नेहरू-लियाक़त समझौते के विरोध में मंत्रिमंडल से 8 अप्रैल 1950 को त्यागपत्र दे दिया।


20वीं शताब्दी का आरम्भ भारत की राजनीति का वह दौर था जिसमें राजनीतिक पराधीनता के साथ वैचारिक अंतर्विरोध और सांस्कृतिक संकट के लक्षण परिलक्षित हो रहे थे। सारे देश में साम्राज्यवाद के खिलाफ एक तीव्र लहर चल रही थी। बंगाल,जो भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक चेतना का मुख्य केंद्र रहा था, के विभाजन की कुटिल ब्रिटिश नीति ने राष्ट्रवाद की धारा को मंद करने के स्थान पर और तीव्र कर दिया था। स्वाधीनता संघर्ष की परिणति भारत की आजादी थी, किंतु विभाजन की त्रासदी ने देश को गहरी वेदना दी। विभाजन के अनिवार्यता को भांप कर, डाॅ मुखर्जी ने बंगाल, असम व पंजाब के एक बड़े हिस्से को पाकिस्तान के चंगुल में जाने से बचा लिया।


पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर लगातर किए जा रहे अत्याचारों व भीषण दंगो के बावजूद पं नेहरु द्वारा पाक प्रधानमंत्री लिकायत अली को भारत में मुस्लिम समस्याओं के संदर्भ में भेजे आमंत्रण प्रस्ताव से खिन्न होकर उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। 16 जनवरी 1951 को आयोजित एक बैठक में पार्टी के घोषणापत्र व संविधान पर चर्चा के बाद "भारतीय जनसंघ"नामक दल के गठन का निर्णय हुआ। 21 अक्टूबर 1951 को जिस दिन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद सरकार का गठन किया था, दिल्ली में चार सौ प्रतिनिधियों के सम्मेलन में इस नवीन संगठन के अध्यक्ष के रुप में डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संस्थापक अध्यक्ष घोषित किया गया।


जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को लेकर उन्होंने आंदोलन किया ही, किन्तु हैदराबाद और जूनागढ़ राज्यों के भारतीय संघ में विलय की बाधाओं को दूर कराने में भी डाॅ मुखर्जी ने सरदार पटेल के साथ मिलकर मंत्रिमण्डलीय बैठकों के निर्णयों को राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में मोड़ने का सफल प्रयास किया। डाॅ.साहब इस बात से बहुत व्यथित थे कि देश के नागरिकों को अपने ही देश के एक राज्य में जाने के लिए अनुमति-पत्र लेना पड़ता है। इसीलिए जब देश के दो प्रमुख सांसदो श्री उमाशंकर त्रिवेदी तथा विष्णु घनश्याम देशपाण्डे को बिना परमिट के प्रवेश की अनुमति न देकर गिरफ्तार कर लिया गया तो डाॅ मुखर्जी ने इसे देश के नागरिकों का स्वदेश में अपमान मानते हुए जम्मू-कश्मीर की ओर प्रस्थान किया। 23 जून 1953 को श्रीनगर के एक बंगले में नजरबन्दी के रुप में रहस्यमय परिस्थियों में उनकी मौत ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया।


हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट फैक्ट्री, बेंगलुरु, उर्वरक कारखाना, सिंदरी तथा लोकोमोटिव कारखाना, चित्तरंजन, इण्डस्ट्रियल फाइनेंस कारपोरेशन, आल इण्डिया हैण्डीक्राफ्ट बोर्ड, आल इण्डिया हैण्डलूम बोर्ड, खादी ग्रामोद्योग बोर्ड जैसे संस्थान डाॅ मुखर्जी की औद्योगिक नीति(1948) की देन है। स्वावलंबन व स्वदेशी के मार्ग पर चलकर इस नीति में उन्होंने वस्त्र उद्योग के व्यापक विस्तार की योजना को मूर्त रूप दिया। उसी का यह प्रतिफल है की भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में आज वस्त्र उद्योग की सबसे बड़े उद्योगों में गिनती होती है।भिलाई और राउरकेला में कालांतर में स्थापित इस्पात संयंत्रो की पृष्ठभूमि भी डाॅ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मंत्रित्व काल में ही बनी।भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु, साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स, यूनिवर्सिटीज कालेज आफ साइंस व शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय,कोलकाता जैसे राष्ट्रीय स्तर के संस्थानो के प्रशासनिक समितियों में रहकर उन्होंने इन संस्थानों की संवृद्धि के भरसक प्रयास किए।


भारतीय भाषाओं के संपोषण का प्रश्न रहा हो अथवा मातृभाषा बांग्ला के प्रति आदर व अनुराग का भाव। वह पूर्ण रुप से भारत व भारतीयता के प्रति समर्पित थे।स्नातक में अंग्रेजी में उत्कृष्ट अंक अर्जित करने बावजूद अपने पिता सर आशुतोष मुखर्जी की सलाह पर उन्होंने बांग्ला भाषा में एम ए किया और विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। डाॅ मुखर्जी द्वारा विज्ञान की शिक्षा बांग्ला में उपलब्ध कराने के लिए वैज्ञानिक शब्दावली का संकलन कराया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय में डाॅ मुखर्जी की पहल पर 1937 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा बांग्ला में प्रथम दीक्षांत भाषण हुआ। चाहे हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की मुहिम रही हो या उर्दू,हिन्दी और बांग्ला जैसी भारतीय भाषाओं के बी ए पाठ्यक्रमों को कलकत्ता विश्वविद्यालय में आरम्भ करवाने का निर्णय, डाॅ मुखर्जी ने औपनिवेशिक भाषातंत्र के स्थान पर भारतीय भाषाओं की संवृद्धि व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

डाॅ मुखर्जी पर साम्प्रदायिक, रुढिवादी, कट्टर हिन्दू आदि होने के आरोप लगाएं जाते हैं,जो सही नही है। बंगाली साहित्यकार नजरुल इस्लाम को उनके द्वारा की गयी आर्थिक व चिकित्सकीय सहायता रही हो, उर्दू भाषा के संवर्धन के उनके प्रयास रहें हो अथवा महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष के नाते बुद्ध के अवशेषों के संदर्भ में की गयी उनकी यात्राएं। वस्तुतःवह सर्वधर्म समभाव व वसुधैव कुटुम्बकम की भारतीय परंपरा के संवाहक थे।उनके व्यक्तित्व व कृतित्व का अब तक एकांगी विश्लेषण ही हुआ है।उम्मीद है कि डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक व अकादमिक अवदान का व्यापक नजरिए से मूल्यांकन होगा तथा उनके वैचारिक उत्तराधिकारी डाॅ साहब के शैक्षिक,राजनीतिक वैज्ञानिक योगदान से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के व्यापक अभियान को आगे बढाएगें। जम्मू-कश्मीर मुद्दे के समाधान की दिशा में लिये गये साहसपूर्ण निर्णय से लोकमत में विश्वास बढा है।आशा है अन्य राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी ईमानदार प्रयास होगें जिससे डाॅ मुखर्जी के सपने साकार हो सकेगें।

(लेखक ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी की है)

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