मनुष्यता का सम्मान है मोहम्मद शरीफ को पद्मश्री मिलना

(Image: Video Grab/ANI)

डॉ.अजय कुमार यादव


ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया.

ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया.

ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया.

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..


साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत इस दुनिया को आज तक समझ नही आया। जिन्हें समझ मे आ गया वह 'शरीफ चाचा' कहलाते हैं।


अयोध्या एक बार फिर चर्चा में हैं।अयोध्या के रहने वाले 82 वर्ष के मोहम्मद शरीफ को भारत सरकार ने उनके सामाजिक क्षेत्र में अकल्पनीय सेवा औऱ अप्रतिम योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्मश्री' सम्मान से नवाजा है। दुनिया उन्हें 'शरीफ चाचा' के नाम से जानती हैं लेकिन उन्हें हम सही मायनों में 'मनुष्यता का अग्रदूत' या 'मानवता की मशाल' कह सकते हैं।उनके लिए बस यही कहा जा सकता है कि शरीफ चाचा का सम्मान बड़े से बड़े सम्मान का सम्मान है।


शरीफ चाचा के लिए 1992 का वह दिन कितना कठिन और दारुण रहा होगा जिस दिन शम्भू मार्किट,रकाबगंज का पीरू टेलर उनके बड़े बेटे की शर्ट के साथ उनके घर आया होगा।शरीफ चाचा बताते हैं कि उनका बड़ा बेटा मोहम्मद रईस खान सुलतानपुर में एक केमिस्ट की शॉप पर काम करता है।उन्हें आज तक ठीक ठीक नही पता कि उस दिन क्या हुआ होगा।उनके बड़े बेटे को मार कर उसकी लाश बोरे में भरकर रेलवे लाइन के किनारे फेंक दिया गया था। लाश रेलवे लाइन के किनारे एक महीने तक पड़ी रही।उस लावारिश लाश को पशु पक्षियों ने क्षत-विक्षत कर दिया था।एक दिन थानेदार को उसकी लाश मिलती है और थानेदार क्षत-विक्षत लाश की शर्ट के कॉलर पर लिखे गए "पीरू टेलर ,शम्भू मार्किट,रकाबगंज" आता है। पीरू टेलर थानेदार के साथ वह शर्ट लेकर शरीफ चाचा के घर जाता है।शरीफ चाचा को बेटे की मौत की खबर कुछ इस तरह से मिली थी।अंतिम संस्कार के लिए उन्हें बेटे की लाश नही मिल पाई थी।उस दिन शरीफ चाचा को मिला था केवल पीरू टेलर के द्वारा सिली गयी बड़े बेटे की शर्ट और साथ मे दुःख का अथाह समंदर।कितना हृदय विदारक दृश्य रहा होगा इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है।एक वह दिन था औऱ एक आज का दिन है।पद्मश्री सम्मान पाकर शरीफ चाचा पहली बार मुस्कराए हैं।तबसे शरीफ चाचा ने प्रण लिया कि वे किसी लावारिश लाश को अपने बेटे की गति नही होने देंगे।


शरीफ चाचा के अनुसार वे अब तक लगभग 5000 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं।जिसमे 3000 से ज्यादा हिन्दू,2000 से ज्यादा मुसलमान और सैकड़ों सिख और ईसाई हैं।

मोहम्मद शरीफ को इसके लिए कोई राजकीय सहायता नही प्राप्त होती है।रोजी-रोटी के लिए शरीफ चाचा साइकिल के पंक्चर ठीक करते हैं। अंतिम संस्कार के लिए धन कहाँ से मिलता है इस संदर्भ में उन्होंने एक लोकल पत्रकार को दिए गए इंटरव्यू में बताया था कुछ लोग चंदा दे देते हैं लेकिन यदि कोई लावारिस लाश मिलती है तो वो चंदे का इंतजार नही करते हैं।साइकिल ठीक करने से जो थोड़ी आमदनी होती है, उसमें से जो थोड़ा पैसा बचता है उसे अंतिम संस्कार में लगा देते हैं।


उन्होंने बताया कि वे हर लाश को अपने लाल(बेटा) की लाश मानकर अंतिम संस्कार करते हैं।82 साल की उम्र हो गयी लेकिन आज भी वे दिन में एक बार नजदीकी अस्पताल,थाना और मुर्दा घर जाकर लावारिस लाशों के बारे में पूछते हैं।72 घंटे तक यदि किसी लाश का कोई संबंधी नही मिलता तो उसे लावारिस मान कर शरीफ चाचा को सौंप दिया जाता है।यदि दिन में उनके जाने से पहले ही कोई लावारिस लाश मिलती है तो जिला प्रशासन उन्हें फोन करके बुला लेता है।शरीफ चाचा बताते हैं कि कई बार अंतिम संस्कार के लिए मिलने वाली लाशें बहुत सड़ी और गली अवस्था मे होती हैं।कई बार पूरा का पूरा कफन खून में सना होता है।लेकिन चाचा उसे विधिवत धर्म के अनुसार सभी रीति रिवाज को पूरा कर के ही अंतिम संस्कार करते हैं।यह सब काम पिछले 28 सालों से वह निस्वार्थ भाव से कर रहे हैं।उनके इस निस्वार्थ भाव के लिए ही यह पद्मश्री सम्मान दिया गया है।शरीफ चाचा जो कर रहे हैं यह परोपकार की पराकाष्ठा है।सही मायनों में शरीफ चाचा साइकिल के पंक्चर नही ठीक कर रहे हैं, वह हमारे समाज और मनुष्यता में हो चुके पंक्चर को ठीक कर रहे हैं और शरीफ चाचा का सम्मान मनुष्यता और मानवीय मूल्यों का सम्मान है।


( लेखक ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। )


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