बहुत जरूरी है सिकल सेल रोग की रोकथाम

2021 में ‘विश्व सिकल सेल दिवस’ की 42वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। सिकल सेल सोसायटी द्वारा केंद्र सरकार, डॉक्टर्स, पेरेंट्स, गैर सरकारी संगठनों और अन्य इच्छुक लोगों के साथ मिलकर जागरूकता बढ़ाने और सिकल सेल रोग से पीड़ित लोगों का समर्थन करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है





सरवन सिंह बघेल


राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सिकल सेल एनीमिया के बारे में लोगो को जागरूक करने के लिए हर साल 19 जून को पूरे विश्व में विश्व सिकल सेल दिवस मनाया जाता है। ‘विश्व सिकल सेल दिवस’ संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2008 में स्थापित किया गया था, ताकि सिकल सेल रोग के प्रति आम जनता में इसके बारे में जागरूकता बढ़ सके। 2009 में 19 जून को पहली बार इस दिन को मनाया गया। इस दिवस की घोषणा का उद्देश्य समाज में सिकल सेल एनीमिया के बारे में जानकारी देना, उसके बचाव के उपायों को लोगो बताना और इससे सावधानी रखने के बारे में जागरूक करना है। आज विश्वभर में इस रोग पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सम्पूर्ण विश्व के कई राष्ट्र मिलकर कार्य कर रहे हैं।


इस वर्ष 2021 में ‘विश्व सिकल सेल दिवस’ की 42वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। सिकल सेल सोसायटी द्वारा केंद्र सरकार, डॉक्टर्स, पेरेंट्स, गैर सरकारी संगठनों और अन्य इच्छुक लोगों के साथ मिलकर जागरूकता बढ़ाने और सिकल सेल रोग से पीड़ित लोगों का समर्थन करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। कोरोना महामारी के कारण इस वर्ष लगभग सभी कार्यक्रम वेबिनार के माध्यम से किये जा रहे हैं। हमारा लक्ष्य है कि हम तकनीकी का प्रयोग कर अधिक से अधिक लोगो तक सिकल सेल के बारे में जागरूकता बढ़ाएं।


सिकल सेल एनीमिया को लेकर केंद्रीय मंत्री श्री अर्जुन मुंडा और जनजातीय कार्य मंत्रालय बहुत सक्रिय हैं। पिछले कई वर्षों से लगातार भारत की महत्वपूर्ण संस्थाओं के साथ इस अनुवांशिक समस्या पर नियंत्रण और उपचार के उपायों के बारे में जागरूकता फ़ैलाने के लिए कार्य कर रहा हैं। मंत्रालय के साथ फिक्की, अपोलो हॉस्पिटल, फोर्टिस हॉस्पिटल, सर गंगाराम हॉस्पिटल, नोवर्टिस और ग्लोबल अलायंस ऑफ़ सिकल सेल डिजीज ऑर्गेनाइजेशन, पिरामल फाउंडेशन सहित अन्य कई महत्वपूर्ण संस्थाएं कार्य कर रही हैं। 19 जून, 2020 को इन सभी संस्थानों ने जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ मिलकर ‘नेशनल सिकल सेल कॉन्क्लेव’ नामक वेबिनार का आयोजन किया था। अलायंस ऑफ़ सिकल सेल डिजीज ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना एम्सटर्डम, नीदरलैंड में 10 जनवरी, 2020 को हुई थी। इस संगठन की स्थापना सिकल सेल रोग से पीड़ित समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए हुई थी। अंतर्राष्टीय सिकल सेल दिवस 2020 पर जनजातीय कार्य मंत्रालय और पिरामल फाउंडेशन ने मिलकर सिकल सेल सपोर्ट कार्नर बेब पोर्टल लाँन्च किया। इसके अतिरिक्त द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट और नोवर्टिस इंडिया लिमिटेड द्वारा हमारे मंत्रालय के साथ मिलकर “स्टेपिंग आउट ऑफ़ शैडोज – कॉम्बैटिंग सिकल सेल डिजीज इन इंडिया नामक एक शोध पत्र प्रकाशित किया।


जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आजादी के 75 साल के समारोह के उपलक्ष्य में अमृत महोत्सव के तहत कई महत्वपूर्ण पहल की है। 19 जून, 2021 को सिकल सेल दिवस के दिन जनजातीय कार्य मंत्रालय ने पिरामल फाउंडेशन, नोवार्टिस, सर गंगा राम अस्पताल, फोर्टिस अस्पताल और FIICII जैसी विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से एक वेबिनार आयोजित किया गया। इस संबंध में, पूर्व में आयोजित वेबिनार 19 जून, 2020 को 'सिकल सेल डिजीज सपोर्ट सेंटर' (https://scdcorner.in/) का शुभारंभ जनजातीय कार्य मंत्री श्री अर्जुन मुंडा द्वारा किया गया था। पोर्टल को मंत्रालय की सीओई योजना के तहत वित्तीय सहायता के माध्यम से पीरामल स्वास्थ्य प्रबंधन और अनुसंधान द्वारा विकसित किया गया है।


इसके बाद सिकल सेल रोग (एनसीएससीडी) पर राष्ट्रीय परिषद, संयुक्त सचिव (स्वास्थ्य मंत्रालय), संयुक्त सचिव (जनजातीय कार्य मंत्रालय), एमओएचएफडब्ल्यू की सह-अध्यक्षता के तहत के तहत कमिटी गठित की गई थी। इसके बाद, 22 अक्टूबर 2020 को एनसीएससीडी की पहली बैठक आयोजित की गई जो सिकल सेल के रोगियों के उपचार और रोग पर नियंत्रण करने के एजेंडे पर कार्य कर रही हैं। यह मंत्रालय सिकल सेल रोग को लेकर काफी संवेदनशील है और इसके नियंत्रण के लिए लगातार कार्य कर रहा हैं।


जनजातीय कार्य मंत्रालय ने सर गंगा राम अस्पताल, नई दिल्ली को मंत्रालय की अनुसंधान योजना के तहत "अनुसंधान अध्ययन कार्यक्रम और परियोजनाएं: सिकल सेल रोग से सम्बंधित चिकित्सा अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए मॉड्यूल" पर एक परियोजना को मंजूरी दी है। संगठन ने चिकित्सा अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए मॉड्यूल तैयार किए हैं जो विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा और पुनरीक्षण की प्रक्रिया में हैं।


राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के अनुसार, सारी रक्त बैंको के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि वे उन रोगियों के लिए नि:शुल्क रक्त/रक्त घटक देंगे जिन्हें सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और हिमोफिलिया जैसे रोग हैं, जिन्हें अनुवांशिक समस्या के लिए जीवन रक्षक जरूरतों के रूप में खून की आवश्यकता पड़ती है। मंत्रालय के प्रयासों से राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम में सिकल सेल एनीमिया को भी शामिल कर लिया है।


हमारे मंत्रालय के द्वारा एक स्वास्थ्य प्रकोष्ठ बनाया गया हैं जो जनजातीय कार्य मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के मध्य मिलकर सिकल सेल एनीमिया के लिए कार्य कर रहा हैं। वर्ष 2018 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भारत के अन्दर ही हीमोग्लोबिन रुग्णता- थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया और अन्य हीमोग्लोबिन रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए एक मसौदा नीति जारी की थी।


शोधकर्ताओं का मानना है कि मानव जैव विकास के दौरान प्राकृतिक अथवा जैविक दबावों में गुणसूत्रों पर स्थित विभिन्न जिंसों (डी.एन.ए) की संरचनाओं में उलट-फेर अथवा उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) होते रहते हैं। जिसके कारण शारीरिक संरचनाओं एवं जैविक क्रियाओं में कई तरह के बदलाव आते हैं। लेकिन कभी-कभी इन उत्परिवर्तनों के कारण मनुष्यों में कई बार ठीक न होने वाली ऐसी संरचनाएँ एवं जटिल विकृतियाँ शरीर में विकसित हो जाती हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती ही रहती हैं। खून से जुड़ी ऐसे ही आनुवांशिकीय विकृति सिकल-सेल-एनीमिया जिसको सबसे पहले अफ्रीकी मूल के आदिवासियों में देखी गई है जो इनके 11वें गुणसूत्रों पर स्थित हीमोग्लोबिन-बीटा जिंसों में हुए उत्परिवर्तनों के कारण विकसित हुई है।


यह बीमारी उम्र बढ़ने के साथ और खतरनाक एवं जानलेवा साबित होती है। इन जिंसों को वैज्ञानिक भाषा में सिकल-सेल जींस कहते हैं जिनके कारण इन आदिवासियों के खून की लाल रक्त कोशिकाएं (आर.बी.सी.) का निर्माण गोलाकार न हो कर हंसियानुमा (सिकल-फॉर्म) होता है। इन विकृत कोशिकाओं को सिकल-सेल्स (कोशिकाएँ) कहतें है जिनकी उम्र 10-20 दिन की ही होती है जबकि सामान्य लाल रक्त कोशिकाओं की 120 दिन तक की होती है। ये सिकल-सेल्स रक्त वाहिनियों में आड़ी-तिरछी इकट्ठी अथवा जमा होकर कई जगहों पर छोटे-बड़े अवरोधक (ब्लॉकेज) बना देती हैं जिससे खून के प्रवाह में रुकावट आने से ऑक्सीजन की कमी के कारण अंग कमजोर व क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। दूसरी ओर इन कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन वर्णक-एस (Hb-S) की मात्रा भी कम होने से ये शरीर में आक्सीजन की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं कर पाती हैं। उक्त कारणों से सिकल-सेल बीमारी से ग्रसित व्यक्ति अक्सर युवावस्था में ही मर जाता है।


आदिवासियों में इन सिकल-सेल जिंसों की उत्पति महान वैज्ञानिक डार्विन की अवधारणा की तर्ज पर तथा मलेरिया दबाव के कारण हुई है। ये जींस उन्हीं क्षेत्रों में ही मिलते हैं जहाँ मलेरिया का प्रकोप अधिक हो या रहा है। इन सिकल-सेल जींस की संरचना जटिल तो है ही, लेकिन अद्भुत है। आदिवासियों में ये प्रकृति प्रदत्त वरदान भी है तो दूसरी ओर ये अभिशाप भी। ये जींस इन्हें खतरनाक व जानलेवा मलेरिया बीमारी के संक्रमण से बचाते हैं वहीं दूसरी ओर ये इनके लिये जानलेवा साबित होते हैं। परन्तु यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि ये जींस इनमें किन प्रारूपों अथवा अवस्थाओं में मोजूद होते हैं। ये प्रमुख रूप से समयुग्मी (Hb-SS) व विषमयुग्मी (Hb-AS) अवस्थाओं में ही मिलते हैं। जो लोग इनके समयुग्मी होतें हैं उनमें ही सिकल-सेल-एनीमिया बीमारी विकसित होती है। डार्विन की अवधारणा, ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट) के अनुसार ये समयुग्मी प्रकृति में जीने योग्य नहीं होते हैं। इसीलिये प्रकृति इन्हें जीने का कोई अवसर भी नहीं देती है।


आनुवांशिकीय दृष्टि से प्रकृति में इनका समाप्त या नहीं होना सर्वथा उपयुक्त एवं उचित भी है। लेकिन जो लोग इन जिंसों के विषमयुग्मी अथवा संवाहक (ट्रेट या कैरियर) होतें हैं उन्हें दोहरा लाभ होता है। एक तो उन्हें मलेरिया कभी नहीं होता है अर्थात इनमें मलेरिया से लड़ने की जबर्दस्त आनुवांशिकीय प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। दूसरी ओर ये संवाहक प्रकृति में सामान्य जीवन जीने के लिये सक्षम होते हैं यानी इन्हें सिकल-सेल-एनीमिया बीमारी नहीं होती है। यही वजह है कि आदिकाल से वनों में रह रही अथवा रहती आ रही आदिवासी प्रजातियाँ आज भी मलेरिया के संक्रमण से सुरक्षित हैं।


जानकारी के अनुसार, विश्व में 4.5 मिलियन से अधिक लोग सिकल-सेल-एनीमिया से ग्रसित हैं वहीं 43 मिलियन से अधिक लोग इस बीमारी के संवाहक (कैरियर) हैं। इनमे 80 प्रतिशत सिकल-सेल-एनीमिया से पीड़ित लोग अकेले अफ्रीका मे हैं। भारत में सिकल-सेल जींस कैसे आए अथवा विकसित हो गए, इसकी न तो सही-सही जानकारी उपलब्ध है और न ही अभी तक इसकी कोई वैज्ञानिकीय पुष्टि हुई है। लेकिन इनको सबसे पहले 1952 में दक्षिण भारत के नीलगिरी पहाड़ियों में बसे आदिवासियों में खोजा गया है। यहाँ के आदिवासियों में ये जींस बहुतायत में पाए जाते है तथा इनकी प्रचलित दर 1 से 40 प्रतिशत तक आंकी गई है।


एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में यह रोग दूसरे स्थान पर है। हालांकि, यह रोग बहुत पुराने समय से ज्ञात है, लेकिन इस पर अधिक काम नहीं किया गया है। यह अफ्रीकी, अरबी और भारतीय आबादी में अधिक पाया जाता है। हमारे देश में यह ‘सिकल सेल बेल्ट’ में अधिक पाया जाता है, जिसमें मध्यम भारत का डक्कन पठार, उत्तरी केरल और तमिलनाडू शामिल है। यह पूर्वी गुजरात, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, पश्चिमी ओड़िशा, उत्तरी तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा केरल के नीलगिरी के पहाड़ी क्षेत्रो में व्यापत है। ओड़िशा में यह रोग आदिवासी समाज में अधिक प्रचलित है। ओडिशा सरकार और केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत संबलपुर जिले में वीर सुरेन्द्र साईं इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च के परिसर में पहला सिकल सेल संस्थान बनाया है। जनजातीय कार्य मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा आयोजित एक राष्ट्रव्यापी स्क्रीनिंग के आधार पर वर्ष 2020 के अध्ययन के मुताबिक आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अब तक लगभग 1 करोड़ 13 लाख 83 हजार 664 लोगो की जाँच हो चुकी है। इस जाँच में लगभग 9 लाख 96 हजार 368 (8.75%) में यह रोग परिलिक्षित हुआ है और लगभग 9 लाख 49 हजार 57 लोगों में लक्षण और लगभग 47 हजार 311 लोग पीड़ित मिले है। भारत में यह व्याधि आदिवासी लोगो में व्यापत है। शोध बताता है कि भारत में आदिवासी समाज में पैदा होने वाले 86 बच्चो में से एक को यह अनुवांशिक समस्या पाई जाती है।


ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों अभी भी इस अनुवांशिक समस्या के प्रति लोगों में भ्रम की स्थिति हैं, जब घर में बच्चे का जन्म होता है और बच्चा बीमार हो जाता है तो अमूमन देखने में आता है कि घर वाले उसे भूतों का साया, नजर लग गयी, किसी ने बच्चे पर जादू-टोना कर दिया आदि बातें करते हैं। वह बच्चो को चिकित्सीय इलाज न देकर ओझा, बाबा व तांत्रिकों के पास ले जाते हैं। वह ईलाज के दौरान बहुत ही अमानवीय व्यवहार पीड़ित के साथ करते हैं। ऐसे में परिवार वालो को चाहिए कि वह बच्चे का सिकल सेल थैलेसीमिया की जाँच कराएँ और बचपन से उसे सिकल सेल के प्रति जागरूक करे कि उसे किस प्रकार से इस अनुवांशिक समस्या के गंभीर होने से बचाना हैं। वैज्ञानिक व आनुवांशिकीय के अनुसार सिकल-सेल अनुवांशिक समस्या केवल उन लोगों में होने की सम्भावना रहती है जिनके माता-पिता अथवा अभिभावक दोनों ही इस अनुवांशिक समस्या के संवाहक होते हैं। ऐसे माता-पिता से पैदा होने वाली 50 प्रतिशत सन्तानें सामान्य होने की सम्भावना रखती हैं, परन्तु 25 प्रतिशत सन्तानें इस अनुवांशिक समस्या के संवाहक होने की तथा 25 प्रतिशत सन्तानों में इस अनुवांशिक समस्या के होने की सम्भावना रहती है। संवाहक अमूमन सामान्य व्यक्ति की तरह ही स्वस्थ्य जीवन जीते हैं। अभी तक सिकल सेल रोग के पूर्ण उपचार के लिए कोई भी दवा विकसित नही हुयी है। एससीडी रोगी को जिन्दा रखने के लिए आवर्ती रक्त आधान की जरुरत पड़ती है। स्टेम सेल थेरिपी, जीन थेरिपी एवं बोनमैरो ट्रान्स्प्लान के द्वारा इलाज करने का प्रयास किया जाता है, परन्तु उसमें भी पीड़ित को लम्बा समय जिन्दा रहने की संभावना नही होती है और ये तकनीकी किफायती नही है। इसी कारण सभी के लिए सुलभ नही है। इसके नियंत्रण के लिये विवाह पूर्व युवक-युवतियों की रक्त परीक्षण कुण्डली का मिलान जरूरी है तथा कई मायनों में यह लाभदायक साबित होती है। इससे इस अनुवांशिक समस्या के संवाहक की पहचान में मदद तो मिलती ही है वहीं कई प्रकार के एड्स जैसे खतरनाक संक्रामक रोगों के संक्रमण होने से बचा जा सकता है। सिकल-सेल अनुवांशिक समस्या लिये बच्चे पैदा न हों इसके लिये जरुरी है कि संवाहकों के बीच न तो विवाह होना चाहिए और न ही इनके बीच शारीरिक सम्बन्ध। सन्तान पैदा करने के पूर्व संवाहकों को आनुवांशिक सलाहकार से परामर्श लेना ज्यादा उचित एवं हितकर होता है।


देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी ने इस अनुवांशिक समस्या को रोकने और समाप्त करने के लिए बहुत जोर दिया हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी ने कई मंचो पर इस अनुवांशिक समस्या का जिक्र किया है और इसके उपचार और नियंत्रण के लिए जनता को जागरूक करने का प्रयास किया है। साथ ही उन्होंने वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिकों और चिकित्सको से इस अनुवांशिक समस्या के ईलाज को खोजने की अपील की हैं। इस अनुवांशिक समस्या का अन्त ही हमारा ड्रीम और प्राथमिक प्रोजेक्ट है। हमें आशा है कि भविष्य में हम नए प्रयासों के द्वारा इस लाईलाज आनुवंशिक समस्या का इलाज खोज लेंगे।


(डॉ सरवन सिंह बघेल (पी.एच.डी.) भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय में कार्यरत हैं।)

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