फ्रांस की घटना दुखद, दुनिया के सामने इस्लाम की सच्ची छवि पेश करने की आवश्यकता

फ्रांस में इस्लाम को बचाने के नाम पर एक अध्यापक का मारा जाना शर्मनाक है। इस्लाम ऐसी शिक्षा नहीं देता। इस हमले की घोर निंदा होनी चाहिए और अपराधियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।


(photo: via Twitter)


डॉ शेख अकील अहमद


16 अक्टूबर को फ्रांस की राजधानी पेरिस के उत्तर-पश्चिम में एक आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें हमलावर ने एक शिक्षक की गला काटकर हत्या कर दी और पुलिस ने हमलावर की गोली मारकर हत्या कर दी। शिक्षक का जुर्म यह बताया जा रहा है कि उसने कथित रूप से अपने छात्रों को इस्लाम के पैगंबर के विवादास्पद रेखाचित्र दिखाए थे। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने हमले को "इस्लामी आतंकवादी हमला" कहा है। इससे पहले 2015 में भी, चार्ली हेब्दो नामक एक अखबार के कार्यालय पर हुए हमले में 12 लोग मारे गए थे। तीन सप्ताह पहले, पत्रिका के पूर्व कार्यालयों के बाहर हुए हमले में दो लोग घायल हो गए थे। हाल ही की एक घटना में, एक स्कूल शिक्षक, एक इतिहास और भूगोल शिक्षक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की शिक्षा देते हुए चार्ली हेब्दो के विवादास्पद रेखाचित्रों के बारे में बात कर रहे थे। कुछ मुस्लिम माता-पिता ने भी स्कूल प्रशासन से इसकी शिकायत की थी। प्रशासन कोई कार्रवाई कर पाता उससे पहले ही यह घटना हो गई।

यह एक सच्चाई है कि इस्लाम के पैगंबर के व्यक्तित्व का इस्लाम और मुसलमानों द्वारा बहुत सम्मान किया जाता है और इस्लामी धारणा के अनुसार, उनकी श्रद्धा हर मुसलमान के लिए आवश्यक है। आज विश्व नैतिकता और सिद्धांतों के अनुसार, हर धर्म की पवित्र पुस्तकों, व्यक्तित्व और प्रतीकों के लिए सम्मान आवश्यक माना जाता है और यह मानवता की भी आवश्यकता है। लेकिन अगर इस्लाम के पैगंबर का अपमान करने की बात है या इस्लाम धर्म के खिलाफ कोई घटना है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम की रक्षा के नाम पर या पैगंबर के नाम पर खड़ा हो और किसी की भी हत्या कर दे। इस्लाम की बुनियादी शिक्षाएं पूरी तरह से इसके खिलाफ हैं और धर्म इसकी अनुमति नहीं देता है।


कानून को अपने हाथों में लेने की अनुमति तो इस्लाम, कुरान और इस्लाम के पैगंबर की शिक्षा भी नहीं देती है। जिस धर्म मेँ कहा गया है कि एक इंसान को अन्यायपूर्ण हत्या से बचाना संपूर्ण मानवता को बचाने के बराबर है। धर्म के नाम पर आतंक फैलाने और हत्या करने की अनुमति कैसे मिल सकती है। ऐसी घटनाओं के कारण मुसलमानों की छवि न केवल एक देश में बल्कि पूरे विश्व में धूमिल होती है और यही कारण है कि आज मुसलमानों को एक सीमित नज़र से देखा जाने लगा है। आज हमें सच्चे इस्लाम का प्रतिनिधित्व करने और अपने व्यावहारिक जीवन में इसकी शिक्षाओं को लागू करने और अपने जीवन मे नैतिकता और चरित्र में एक अच्छी छवि बनाने की आवश्यकता है। हम इस्लाम के सच्चे अनुयायी बनें और दुनिया को शांति और सुरक्षा के लिए आमंत्रित करें। आज की अराजकता और रक्तपात की दुनिया में, अगर एक चीज है जिसकी दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह है शांति । लगभग हर देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हिंसा और अतिवाद है। किसी भी मामले में, यह कभी भी उपयोगी और फायदेमंद नहीं रहा है, यह हमेशा मनुष्य को विनाश, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के रास्ते पर ले जाता है और एक व्यक्ति के अपराध के परिणामों को दुनिया भर के लोगों को भुगतना पड़ता है।


इस्लाम शांति और सुरक्षा का धर्म है। इसकी शिक्षाएं, इसके जीवन दर्शन और इसके सिद्धांत और नियम सभी उत्पीड़न और बर्बरता, उग्रवाद और आतंकवाद के खिलाफ हैं। इस्लाम दुनिया की शांति का संरक्षक है और शांति और सुरक्षा को मानवता के कल्याण का आधार मानता है और एक व्यक्ति को दूसरे इंसान के जीवन और संपत्ति पर आक्रमण करने की अनुमति नहीं देता है। एक जीवन की रक्षा और जीवन की सुरक्षा सम्पूर्ण मानवता का समर्थन और संरक्षण है। (सूरा अल-मईदा: 23) इस्लाम ने न केवल उत्पीड़न, हत्या और क्रूरता की निंदा की है, बल्कि उससे नफरत भी की है और हत्या को एक अपराध माना है।


इस्लाम और हिंसा एक दूसरे के विरोधी हैं, जहाँ इस्लाम है वहाँ हिंसा नहीं खड़ी हो सकती है, हिंसा से लड़ने के लिए इस्लाम सबसे शक्तिशाली हथियार है। हत्या और खून खराबे के अलावा, इस्लाम देशद्रोह, आतंकवाद और झूठी अफवाहों को नापसंद करता है इस्लाम इसे आक्रामक और बर्बर कृत्य करार देता है। सर्वशक्तिमान अल्लाह कहता है: "सुधार के बाद भूमि में फसाद मत करो।" (अल-आराफ: 56)। शांति एक बहुत बड़ा वरदान है, कुरान ने इसका दिव्य उपहार के रूप में उल्लेख किया है: कहा है कि " कुरेश वालों को उस घर के रब की इबादत करनी चाहिए जिस रब ने उन्हें भूख से बचाया, उन्हें खिलाया और भय से शांति दी।" (अल-कुरैश: 4) इस्लाम में शांति के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पैगंबर साहब की जन्मस्थली (अल्लाह का आशीर्वाद और दुआएं उन पर हो) को शांति का मुख्य स्थान घोषित किया गया है। इस स्थान पर कोई फसाद, झगड़ा और हंगामा नहीं हो सकता। अल्लाह तआला फरमाता है: "हर कोई जो इसकी छाया में प्रवेश करता है, वह सुरक्षित होगा।" (आले-इमरान: 97) हुज़ूर अकरम हर दिन, जब वह तहज्जुद के दौरान रात में जागते, तो फरमाते कि ऐ अल्लाह मै गवाही देता हूँ कि सभी इंसान आपस में भाई भाई हैं।


दुनिया के जिस क्षेत्र में और जहाँ जहाँ मुस्लिम और गैर-मुस्लिम मिश्रित आबादी में रहते हैं, वे व्यावहारिक और सामाजिक जीवन में रसूल पाक की गवाही के प्रकाश में एक दूसरे के साथी और दोस्त हैं। इस्लामी दृष्टिकोण से, वे शांति और सुरक्षा और भरोसे के समझौते से बंधे हुए हैं। सभी परिस्थितियों में इस समझौते का पालन करना अनिवार्य है। अगर किसी मुस्लिम देश में अन्य धर्मों के लोग रहते हैं, तो उन्हें उस देश के कानून और संविधान के अनुसार उनके सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक अधिकार मिलने चाहिए। इसी प्रकार जिस देश में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं वो उस देश के संविधान और कानून के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करें और अपने सभी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त करें। किसी भी देश के नागरिक के लिए किसी भी मामले में कानून को अपने हाथों में लेना सही नहीं है। इसलिए, मैं दुनिया के सभी मुसलमानों से अपने कार्यों और कर्मों के माध्यम से इस्लाम की सच्ची शिक्षाओं का एक उदाहरण स्थापित करने की अपील करता हूं ताकि दुनिया की नज़र में इस्लाम या मुसलमानों की झूठी और हिंसक छवि न बनकर एक ऐसी छवि स्थापित हो जो वास्तव में मूल धार्मिक शिक्षाओं और निर्देशों का प्रतिनिधित्व करे।


(निदेशक, राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली)

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