दो दिवसीय सेमिनार: मोहम्मद दारा शिकोह - जीवन और कार्य

Updated: Mar 6


(Miniature portrait of Dara Shikoh c.1640)

9-10अक्टूबर, 2019


छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी सभी रचनाएं अपने रचनाकार की कृति हैं। एक रचना को जिन पड़ावों से गुजरना पड़ता है इसका अनुमान केवल रचनाकार को ही हो सकता है। अरस्तु के अनुसार संसार और संसार के दृश्य अपने मूल का अनुकरण है। इसकी वास्तविक रचना रचनाकार के मस्तिष्क में है अर्थात् अस्तित्व में आने से पूर्व रचना का खाका रचनाकार के दिमाग में अनेक पड़ाव से गुजर चुका होता है। एक शिल्पकार अपने मस्तिष्क में तैयार भवन के निर्माण के लिए ईट पत्थरों का सहारा लेता है। एक चित्रकार रंगों के द्वारा चित्र बनाता है। एक कवि विचारों को शब्दों में पिरोकर शायरी करता है। इस बिन्दू पर साहित्यकार, शायर एकमत हैं कि हम जो कुछ देख रहे हैं यह नकल है। इसका मूल कहीं और है। इंसान केवल एक किरदार है, आता है, तमाशा करता है और अपना किरदार निभा कर चला जाता है। इतिहास लिखने वाले चरित्रों का इतिहास लिखते हैं। जमीन पर खींची हुई लकीरें एक समझौता है। यही लकीरें मानवता और किसी सभ्यता व संस्कृति के अस्तित्व को सुनिश्चित करती हैं। इन सीमाओं में रहते हुए विभिन्न देश अपनी सभ्यता और संस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए स्वतंत्र हैं। प्रत्येक देश की अपनी विशेष सभ्यता और संस्कृति है, उसके लोगों की अपनी अलग पहचान है। वह अपने रूप रंग और भाषा से पहचाने जाते हैं। उनमें जो एकरूपता है वही उनकी पहचान है।


भारत एक मात्र देश है जो अपनी विविधता में एकता की पूंजी से धनवान है। भारत की यही पहचान उसे अन्य देशों पर प्राथमिकता देती है। यही कारण है कि अरब के शुरुआती यात्रियों में जब किसी ने भारत की यात्रा की तो खुशी से वह चिल्ला पड़ा ‘हजा मंदर’ यह तो मंदर है। मंदिर उस जगह को कहा जाता है जहां प्राचीन कलाकृतियां पायी जाती हैं। पृथ्वी पर भारत जैसा देश शायद ही मिलेगा। भौगोलिक, जलवायु, सांस्कृतिक विविधता व रंगारंगी से आंखों को ठंडक और मन को सुकून मिलता है। एक देश में एक ही समय में विभिन्न मौसमों और फल फूलों और खानपान का मजा लीजिए।


भारत की भूमि बहादुरी, हिम्मत, दिलेरी व प्रेम की सुगंध से महक रही है। निजामुद्दीन औलिया और खुसरो के पवित्र भावों से भक्ति गीत व सूफी संगीत में तेज है। सरमद व लाला जादे का प्रेम आज भी बेबाकी की अभिव्यक्ति है। इसी भूमि पर सोनी महिवाल का प्रेम परवान चढ़ा। भारत जब तक रहेगा यहां प्रेमगीत गाए जाते रहेंगे। भारत की उपजाउ भूमि पर काफले आते रहे हैं और यहीं बसते रहे हैं। इसकी संस्कृति को समृद्ध करते रहे हैं, इसकी विविधता को और रंग देते रहे हैं। इस विविधता ने भारत को अन्य देशों की नजरों में उठाने का काम किया है। यहां के साहित्य को कश्मीर के गुलशन के उपमा दी गई है। यहां का हर क्षेत्र अपनी अलग पहचान रखता है। यहां खुसरो का कलाम भी है तानसेन का अलाप भी ,यहां लंबे बाल की शाम भी है और हिरन की आंखों की सुबह भी। यहां राजा महाराजाओं की सुंदरता भी है। जहां दो संस्कृतियों के मिलने से तीसरी गंगा जमुनी संस्कृति का जन्म हुआ। यही वह संस्कृति है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हुए हम तक पहुंची है। आज हमारे भारत को इसी भाईचारे और गंगा जमुनी संस्कृति की आवश्यकता है ताकि हमे हमारी खोई हुई सोने की चिड़िया वापस मिल जाए और जब यह चिड़िया चहके तो सभी देशवासियों के दिलों को शांति मिले। हमारे विद्वान इसी प्रयास में इतिहास के पन्ने पलट रहे हैं कि काश हमें वह स्रोत मिल जाए जिसकी रोशनी में हम आगे बढ़ सकें। अचानक उन्हें दारा शिकोह के रूप में एक ऐसा हीरा हाथ लगा जिससे निकलने वाले प्रकाश से सभी दिशाएं प्रकाशित होती दिखाई दीं।


प्रिय पाठकों! यहां एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि हमारे विद्वानों की नजर दारा शिकोह पर जाकर क्यों रूकी? हालांकि सलतनत काल के अंत से लेकर मुगल काल के अंत तक राजाओं व युवराजों की एक लंबी सूची मौजूद है। हम थोड़ा और अतीत की तरफ देखते हैं तो इतिहास के पन्नों में एक शहजादा और मिलता है जिसने तख्त और ताज, ऐश ओ आराम , शराब व शबाब को ठुकराकर जंगल और एकांत को चुना जिसे संसार गौतम बुद्ध के नाम से जानता है। यदि इस बिन्दु पर विचार विमर्श किया जाए तो यह राज खुलता है कि जीवन अंदेशों से उपर है। कभी जीना जीवन है तो कभी मरना ही जीवन है। जिन्होंने सत्य को पहचान लिया उन्होंने दरबार और सल्तनतों की दीवारों को तोड़ दिया।


दारा शिकोह ने ज्ञान के मार्ग का चयन किया जबकि उसके भाइयों ने हुक्मरानी को चुना जो कारून और फिरऔन की विरासत है। हुक्मरानी में खून बहता है जबकि ज्ञान के मार्ग में प्यार, मुहब्बत और शांति है। दारा ने जब ज्ञान के समुद्र में डुबकी लगाई तो वह इसकी गहराइयों में ऐसा खोया कि उसी का होकर रह गया। जब ज्ञान के सागर से बाहर निकला तो उसके हाथ में दो समुद्रों को जोड़ने वाला पुल यानी रचना ‘मजमउल बहरैन’ थी।


ध्यान किसी एक विषय पर ही केंद्रित हो सकता है। एक ही समय अनेक मोर्चों पर रहना नाकामी का कारण बनता है। दारा के साथ भी यही हुआ। खुदा की मखलूक को प्रेम की माला में पिरोने वाला नुस्खा तैयार करने में राजकीय कार्यो का पूरी तरह ज्ञान हासिल न कर सका इसलिए जंग के मैदान में हार गया। बुद्धि चतुर है सौ भेष बदल लेती हैं। दारा शिकोह पर कुफ्र व नास्तिकता के फतवे लगवाए गए और सत्ता से उत्तराधिकारी को मौत की नींद सुला दिया गया। इसी प्रकार सरमद जिसने दारा के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी को भी शिकार होना पड़ा। दो भाइयों यानी बड़े भाई दारा शिकोह और छोटे भाई औरंगजेब के बीच जंग इस्लाम और कुुफ्र की नहीं बल्कि सत्ता प्राप्ति के लिए थी। एक ने प्रजा से प्रेम किया और दूसरे ने तख्त और ताज से, इसलिए आज की प्रजा ने अपने पुराने उस शुभचिंतक को ढूंढ़ निकाला जिसने दो विचारधाराओं को मिलाकर एक महकता हुआ गुलशन आबाद करना चाहा था।


प्रिय पाठकों! यहां फिर एक प्रश्न पैदा होता है कि इस विकसित होती तकनीक के दौर में हम एक कदम भूले बिसरे शहजादे के जीवन को क्यों दोहराना चाहते हैं? अब तो जीवन यापन के बेहतर से बेहतर साधन मौजूद हैं। नए भारत के निर्माण में पुराना नुस्खा क्यों ढूंढ़ रहे हैं? यहां मुझे इकबाल की याद आ रही है-


निगे बुलंद सुखन दिलनवाज जां पुरसोज

यही है रख्ते सफर मीर ए कारवां के लिए।


हमारे दिलों पर सोज रखने वाले दूरदर्शी कारवां के अमीर ने स्थिति को समझ लिया इस लिए पुकार उठे-

लौट माजी की तरफ ए गरदिशे अय्याम तू


आर्थिक विकास, सांस्कृतिक विकास, धन की बहुलता से बड़े-बड़े कारखाने , बड़े-बड़े संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं जिनका उद्देश्य धन कमाना है। इस स्थिति तक पहुंचकर खुदी मर जाती है, खुदगर्जी बढ़ जाती है आदमी जीवित रहता है, इंसान व इंसानियत दम तोड़ देती है। इसलिए आर्थिक,सांस्कृतिक और तकिनीकी विकास के साथ-साथ मानवीयता,प्रेम और भाईचारे के विकास के लिए शैक्षिक व प्यार मुहब्बत पर आधारित समाज की आवश्यकता है। यह आवश्यकता हमें इसी गंगा जमुनी संस्कृति और मजमउल बैहरैन की ओर ले जाती है। नहीं तो समाज बिखर जाएगा। जीवन छिन्न-भिन्न हो जाएगा। हुकुमतें बरबाद हो जाएंगी।


इन्ही बिन्दुओं पर विचार करने के बाद राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के निदेशक डा. शेख अकील अहमद ने मुहम्मद दारा शिकोह के राष्ट्रीयता की अवधारणा के विचार पर दो दिवसीय सैमिनार का आयोजन करने का निर्णय किया। जिसका आयोजन स्कोप ऑडीटोरियम, लोधी रोड, नई दिल्ली में 9-10 अक्टूबर, 2019 को किया गया। इस सेमिनार का विषय ‘दारा शिकोह: जीवन और कार्य ’ रखा गया। इस कार्यक्रम में दारा शिकोह के जन्म से लेकर उनके कार्यों पर प्रकाश डाला गया।


उद्घाटन सत्र: 9 अक्टूबर 2019, 10:30 बजे से 12:00 बजे तक


कार्यक्रम का आरंभ 9 अक्टूबर सुबह 10:30 बजे हुआ। परम्परा के अनुसार तहसीन मुनव्वर ने संचालन कार्य संभाला। सबसे पहले आर एस एस के संयुक्त महासचिव डा. कृष्ण गोपाल को मंच पर आमंत्रित किया गया, इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तारिक मंसूर और जामिया मिल्लिया इस्लामिया की कुलपति प्रो. नजमा अख्तर को आमंत्रित किया गया। इन सभी मेहमानों के साथ उर्दू परिषद के उपाध्यक्ष प्रो. शाहिद अख्तर और निदेशक डा. शेख अकील अहमद ने दीप जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।


कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए उर्दू परिषद के उपाध्यक्ष प्रो. शाहिद अख्तर ने स्वागत वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि आज इस सभागार में जिस व्यक्ति के जीवन पर चर्चा होनी है वह एक शहजादा जरूर है लेकिन उसकी नजर अपने शहंशाह बाप के तख्तो ताज पर नहीं बल्कि प्रजा पर है, वह शहजादा दरबार में ऐश करने की बजाए सूफी संतों और योगी व संन्यासियों से ज्ञान प्राप्त कर रहा था। ऐसे शहजादे पर यह सेमिनार मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने आगे कहा कि दारा शिकोह ने संसार के अन्य देशों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता का परिचय कराया उपरोक्त विचारों के साथ प्रो. शाहिद अख्तर ने अपनी बात पूरी की। इसके बाद उर्दू परिषद के निदेशक डा.शेख अकील अहमद ने अपने परिचय वक्तव्य में मुहम्मद दारा शिकोह के जीवन के उतार-चढ़ाव पर विस्तार से रोशनी डालते हुए कहा कि, दारा शिकोह पर सेमिनार समय की मांग है क्योंकि दाराशिकोह भारतीयता की अभिव्यक्ति और सर्वधर्म एकता की एक स्पष्ट निशानी थे। अगर वह सौभाग्य से हिन्दुस्तान के शासक होते तो हमारे देश का इतिहास,तस्वीर और तकदीर एकदम बदली हुई होती। सर्वधर्म संभाव का विचार सबसे पहले दारा शिकोह ने ही दिया था। उसका विजन बहुत विस्तृत था और इस रूहानियत पर यकीन रखता था जो इंसानों से नफरत नहीं प्रेम करना सिखाता है। दारा शिकोह के विचारों को आम करने की जरूरत है, इसी मकसद को परा करने के लिए उर्दू परिषद दारा शिकोह की सभी पुस्तकों के प्रकाशन के साथ-साथ उर्दू में उसके अनुवाद भी करा रही है।


डा. अकील अहमद ने दारा शिकोह के जीवन के संदर्भ में उनके जन्म और ख्वाजा के शहर अजमेर और उसकी बरकतों का जिक्र किया जिसके प्रभाव से दारा का मन मस्तिष्क प्रकाशित हुए। दारा शाहजहां का तीन बेटियों के बाद पहला बेटा था। दारा ने जो कारनामे अंजाम दिए वह आज भी आमजन की नजरों में प्रिय हैं। उसकी विचारधारा को एक नमूने के तौर पर और अंदाजे हुक्मरानी के तौर पर देखने की कोशिश की जा रही है। देश और लोगों को आज विचार की आवश्यकता है जिसमें प्रेम, भाईचारा और मानवता का सम्मान शामिल है।


उन्होंने आगे कहा कि यह वो व्यक्ति था जो हिन्दुस्तान के मिलेजुले समाज में विश्वास रखता था और जो न केवल सभी धर्मों का सम्मान करता था बल्कि उसका मानना था कि दुनिया के सभी धर्म एक हैं, रास्ते अलग अलग सही मगर मंजिल एक है। हर धर्म में सच्चाई और सत्य मौजूद है। हर धर्म एक आलोक की तरह है और सबसे बड़ी बात यह कि उसने हिन्दु और इस्लाम धर्म के बीच साझा बिन्दु को तलाश किया और यह साबित किया कि हिन्दू और इस्लाम धर्म में बहुत सी चीजें एक जैसी हैं। दोनों के विश्वास और नैतिकता में बहुत सी बाते समान हैं विशेष तौर पर दोनों का ऐकेश्वरवाद में विश्वास है, सज़ा और बदले का विश्वास एक है और भी बहुत सी बातें हैं जो दोनों में साझा हैं। सच तो यह है कि हमारे देश केा आज इस विचार और इस पर अमल करने की आवश्यकता आन पड़ी है। इसके अलावा सारे उसूल विनाश की ओर ले जाएंगे। समय का सच्चा मार्गदर्शक ऐसे हालात से बचने के लिए इतिहास के पन्नों को उलटता है। हुकुमतों के बने रहने और मिट जाने के कारणों को तलाश करता है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए रोशनी मिल जाए। इस विषय पर सोचते हुए डा. अकील अहमद ने दारा शिकोह के कार्यो पर सटीक चर्चा की और दारा शिकोह के इल्मी कार्यों का उदाहरण दिया। उन्होंने सफीनतुल औलिया, सकीनतुल औलिया, रिसाला हकनुमा और हस्नातुल आरफीन की भी चर्चा की। डा. अकील अहमद ने कहा कि हिन्दुस्तानी दर्शन सभ्यता और संस्कृति पर दारा शिकोह का सबसे बड़ा एहसान यह है कि उसने उन उपनिषदों को बाहरी दुनिया में पहचान दिलाई जिसमें हिकमत व ज्ञान का खजाना था। वही पहला व्यक्ति था जिसने 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया और हिन्दू मत और इस्लामी तसव्वुफ के बीच एक साझी बुनियाद की तलाश की,उन्ही के अनुवादों के बाद उपनिषद का अनुवाद फ्रांस ,जर्मनी और दूसरे पश्चिमी देशों में हुआ। प्रसिद्ध फ्रांसीसी पर्यटक बरनियर इस अनुवाद को फ्रांस ले कर गए। एक प्रसिद्ध फ्रांस के दार्शनिक विक्टर कुसिन ने वेदांत की तारीफ करते हुए कहा कि यह इंसानी कायनात का एक महान दर्शन है। पश्चिमी देशों में उपनिषद को पहचान दिलाने का सेहरा दारा शिकोह के सर जाता है। अगर दारा शिकोह ने इसमें दिलचस्पी न दिखाई होती तो उपनिषद का प्रभाव क्षेत्र इतना विस्तृत न होता।


इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने दारा शिकोह के जीवन और उनके कार्यों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि दारा सभी धर्मों की अच्छी बातों को अपनाता था, उनकी विशेषताओं पर भरोसा करता था। दारा के अनुवाद पर चर्चा करते हुए उन्होंने उपनिषद की व्याख्या प्रचार पर प्रकाश डाला। मजमउल बहरैन को विचारों का संगम बताते हुए दारा की विभिन्न योग्यताओं बहुभाषी ज्ञान, धर्म दर्शन और साहित्य कला पर बात करते हुए अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दारा शिकोह चेयर की स्थापना करने की सूचना दी और दिल्ली में किसी कंेद्रीय स्थल पर दारा शिकोह केंद्र की स्थापना किए जाने का सुझाव दिया साथ ही दारा पर डा. कृष्ण गोपाल के कार्यों की प्रशंसा की।


इसके उपरांत जामिया मिल्लिया इस्लामिया की कुलपति प्रो. नजमा अख्तर ने दारा की राष्ट्रीय एकता और साझा संस्कृति की पक्षधरता पर चर्चा करते हुए मजमउल बहरैन का उदाहरण दिया। अपनी चर्चा को बहुत संक्षिप्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की सत्ता के लिए उनके भाई औरंगजेब ने दारा की हत्या कर दी। इस अवसर पर उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पुस्तकालय में दारा शिकोह पर एक विंग की स्थापना करने की बात कही और दारा पर एक विशेष पेपर शुरू किए जाने की बात कही। अंत में प्रो. नजमा अख्तर ने डा. कृष्ण गोपाल द्वारा दारा पर उठाए गए उनके कदमों की प्रशंसा की।


इसके बाद मुख्य अतिथि आर एस एस के संयुक्त महासचिव डा. कृष्ण गोपाल ने अपना विस्तृत वक्तव्य दिया। सबसे पहले उन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता में एकता पर प्रकाश डाला और बहुधर्मीय देश होने की विशेषता बयान की। उन्होने आगे कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सबको साथ लेकर चलना है। यहां बहुत सारे धर्म हैं उनमें अच्छी बातें ग्रहण करना देश की खूबी है। दारा ने भारतीय परम्परा को समझने का प्रयास किया है। दारा ऐसा शहजादा था जो अध्ययन का बहुत शौकीन था, वह हर धर्म के विद्वानों के पास जाता था और चर्चा करता था।


डा. कृष्ण गोपाल ने आगे कहा कि दारा और उसकी बड़ी बहन जहां आरा के बीच दोस्ती का रिश्ता था। दोनों दोस्तों की तरह रहते थे,एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। जहां आरा भी पढ़ी लिखी योग्य शहजादी थी। डा. कृष्ण गोपाल ने दारा की दर्दनाक हार पर विस्तार से चर्चा की और कहा कि दारा प्रजा का हित अधिक चाहता था न कि सत्ता का। दारा ने दो धर्मों के लोगों को करीब करने का प्रयास किया इसके लिए दोनो धर्मों के विद्वानों और पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त किया। कड़े कानून और नियमों के स्थान पर प्यार मुहब्बत से दिलों को जोड़ने, जमीनों और सरहदों के बजाए दिलों को जीतने की कोशिश की। इसके लिए ऐसा संविधान तैयार किया जिस पर आज सेमिनार और सिम्पोजियम आयोजित हो रहे हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तो दारा की रचना मजमउल बहरैन आसक्ति का नियम है। यही कारण थे जिनकी प्राप्ति के लिए दारा शासकीय कार्यों में प्रवीणता हासिल नहीं कर सका जिसका परिणाम यह हुआ कि वह सत्ता से और जीवन से वंचित हो गया। तुलनात्मक अध्ययन की शुरूआत दारा शिकोह ने की, दारा ने फारसी और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने में बहुत मेहनत की और समय लगाया, दारा विश्व का पहला व्यक्ति है जिसने फारसी और संस्कृत से अनुवाद करके ज्ञान को आगे बढ़ाने का काम किया।


डा. कृष्ण गोपाल ने आगे कहा कि शाहजहां के वह कानून जो जनता के हित में नहीं थे और जिनसे आम लोगों को नुकसान पहुंचने की आशंका थी दारा ने बादशाह से बात करके उनको खत्म करवाया। शाहजहां भी उसकी बात का सम्मान करता था। उन्होंने आगे कहा कि उस जगह से अच्छी बातें लेकर आने का नाम दारा है, वह एकेश्वरवादी था। हर कोई एकेश्वरवाद को मानता है बस भाषाएं अलग-अलग होती हैं। दारा शिकोह पुस्तकालय की स्थापना दिनांक 1634 बताते हुए उन्होंने कहा कि यह ऐसा शहजादा था जिसके अंदर अध्ययन का अत्यधिक शौक था, अध्ययन की वजह से विभिन्न स्थानों पर शासकीय कार्यों के कारण रहता और सूफी संतों की संगति करता और उनसे लाभ प्राप्त करता।


डा. कृष्ण गोपाल के व्याख्यान से दारा शिकोह के जीवन और कार्यों पर पूर्ण रूप से प्रकाश डाला गया और विभिन्न पहलुओं को सामने लाया गया। दारा के देश प्रेम के साथ साथ गंगा जमुनी संस्कृति और प्रचार की जानकारी भी मिली जो भारतीय समाज के शेष रहने और विकसित करने के प्रति उत्तरदायी है। कार्यक्रम के अंत में उर्दू परिषद की सहायक निदेशक (अकादमिक) श्रीमति डा. शमा कौसर यजदानी ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके साथ ही इस सत्र का समापन हुआ।


प्लीनरी सत्र: 9 अक्टूबर 2019, 12:15 बजे से 1:00 बजे तक


दारा शिकोह के जीवन और कार्य पर प्लीनरी सत्र डा. अली अकबर शाह के संचालन में शुरू हुआ। सत्र की अध्यक्षता पूर्व डीन फेकल्टी ऑफ ला, ए एम यू अलीगढ़, प्रो. मुहम्मद शब्बीर ने की। सत्र को इंस्टीट्यूट ऑफ परशियन रिसर्च ए एम यू अलीगढ़, की सलाहकार प्रो. आजरमी दुख्त सफवी ने बीज वक्तव्य दिया। अपनी बात फारसी से शुरू करते हुए उन्होंने गालिब का एक शेर पढ़ा-


है रंगे लाला ओ गुल व नसरीं जुदा जुदा

हर रंग में बहार का इसबात चाहिए।


मुहतरमा का मकसद विभिन्न रंगों व नस्लों में एकता की शक्ति के महत्व को बताना था जिससे रंग रंग के मोतियों से पिरे हार की खुशरंगी और खुशनुमाई में दिलकशी पैदा हो जाती है। उनकी बात बहुत ज्ञानवर्धक थी। फारसी के साथ उन्होंने बीच में अंग्रेजी भाषा का भी सहारा लिया। उनके वक्तव्य में दारा से पूर्व के सूफियों का संदर्भ था, जहां अतीत में एकता की शिक्षा दी जाती थी। उन्होंने कहा कि खुसरो के अनुसार संस्कृत दुनिया की सबसे पूर्ण भाषा है। उन्होंने कहा कि दारा शिकोह ने कोई नई अजनबी नहीं कही है उसके सामने दरबारी तारीख में एकता का अतीत था। उन्होंने अकबर के दरबार के एक शायर उरफी का राष्ट्रीय एकता पर एक शेर पढ़ा। दारा के सामने एक ऐसा अतीत था जिसको आधार बनाकर दारा ने राष्ट्रीय एकता की इमारत को खड़ा किया लेकिन इस दुनिया ने हर सच्चे को जहर का प्याला दिया। दारा ने पुरानी शराब को नया गिलाफ दिया। उसने इरफानी परम्परा को प्रभावकारी मोड़ दिया, वैज्ञानिक अंदाज में डाला। उन्होंने कहा कि दारा ने एकेश्वरवाद का ज्ञान उपनिषद से प्राप्त किया। दुनिया की कोई भी व्यवस्था तर्क के बिना नहीं चल सकती, मानवीय समाज को विकास व गति देने के मामले में दारा नंबर एक पर था। इसके बाद सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. शब्बीर ने अपने विचार अंग्रेजी भाषा में रखे। उन्होंने वर्तमान स्थिति की आलोचना करते हुए धार्मिक एकता पर बात की और दारा शिकोह के विचारों को लागू किए जाने का सुझाव दिया।


पहला सत्र : 9 अक्टूबर 2019, 1:30 बजे से 3:00 बजे तक


कार्यक्रम के पहले सत्र की अध्यक्षता प्रो. तलहा रिजवी बर्क ने की जबकि संचालन कार्य मुमताज आलम रिजवी ने किया। सबसे पहले प्रो. सैयद एनुल हसन ने अपना शोध पत्र जो बारह बिन्दुओं पर आधारित था प्रस्तुत किया। उन्होंने विशेष तौर पर दारा शिकोह के एकेश्वरवाद पर दृष्टिकोण और रूहानियत पर बात की। उन्होंने राष्ट्रीय विचारधारा पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जब विभिन्न धर्म और वर्ग एकजुट होते हैं तो एक राष्ट्र का निर्माण होता है। उनके अनुसार देश की सीमाओं के भीतर निवास करने वाले सभी धर्म, वर्ग आदि एक कौम एक राष्ट्र हैं। उनके लिए हर धर्म व वर्ग के लोगों का सम्मान करना आवश्यक है। इसके बिना देश कमजोर होगा।


इस सत्र में दूसरा पेपर प्रो. सैयद मुहम्मद अजीजुद्दीन ने पढ़ा। उन्होंने मुगलों की शासन व्यवस्था पर चर्चा करते हुए दारा के जीवन और विचार करने के तरीके पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दारा सूफी नहीं था। मुगलकाल में ज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौर में भी अनुवाद कार्य के लिए एक टीम थी। उन्होंने दारा पर लगाए गए कुफ्र के फतवों और उनकी हत्या पर रोशनी डाली और कहा कि दारा और औरंगजेब के बीच कुफ्र और इस्लाम की जंग नहीं थी बल्कि पूरा मामला सत्ता के लिए था। प्रो. सैयद मुहम्मद अजीजुद्दीन ने कहा कि खिजराबाद के पास जो पार्क है उसका नाम दारा के नाम पर होना चाहिए।


सत्र में तीसरा और अंतिम पेपर शरीफ हुसैन कासमी ने पढ़ा जो प्राचीन भारतीय संस्कृति पर था। उन्होंने कहा कि विश्व के सभी पुस्तकालयों में दारा की कोई न कोई पुस्तक मौजूद है। उन्होंने प्रारंभिक भारतीय इतिहास लेखन और अनुवाद कला पर बात की और उपनिषद व सिर्रे अकबर का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अकबर भारत के हिन्दू मुसलमानों के मतभेदों को दूर करना चाहता था। उन्होंने दारा के ख्वाब के बारे में भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि दारा ने सब काम चालीस साल की उम्र में किया, वह सत्ता का नहीं ज्ञान का प्यासा था। सांसारिक सुख में उसकी कोई रूचि नहीं थी। दारा ने सोने की कुर्सी पर बैठने प्रस्ताव दिल से स्वीकार नहीं किया था। इस तरह इस सत्र का समापन हुआ।


दूसरा सत्र: 9 अक्टूबर 2019, 3:15 बजे से 5:30 बजे तक


दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. शरीफ हुसैन कासमी ने की जबकि संचालन कार्य डा. शफी अय्यूब ने संभाला। पहला शोध पत्र प्रो. सैयद हुसैन अब्बास ने पढ़ा जिन्होने दारा के ज्ञान और उसकी रचनात्मक सेवाओं पर चर्चा की। उन्होंने अपनी बात दारा की रचना मजमउल बहरैन से की। उन्होने कहा कि दारा शिकोह को शेर लिखने में गहरी रूचि थी और उनका कवि नाम कादरी था। उन्होंने दारा के अनुवाद कार्य का भी वर्णन किया। उनकी बात दारा की ज्ञान में रूचि और रचनात्मक सेवाओं पर विशेष तौर पर केंद्रित रही। इसके बाद दूसरा पेपर प्रो. सलमा महफूज, संस्कृत प्रोफेसर, ए एम यू अलीगढ़ ने पढ़ा जिसमें उनके गहन अध्ययन की झलक भी देखने को मिली। उन्होंने दारा शिकोह का उपनिषद से संबंध पर चर्चा की और इस्लाम व हिन्दू धर्म की समानता से संबंधी दारा के विचार व्यक्त किए। उन्होंने संस्कृत के उदाहरण भी प्रस्तुत किए जिन पर दारा ने बहुत काम किया है। उन्होंने मजमउल बहरैन और उसकी भाषा पर भी चर्चा की। दारा कुरआन का अध्ययन भी किया करता था इस संबंध में दारा के विचारों पर भी बात की। प्रो. सलमा महफूज ने वेदांत को आसमानी पुस्तक मानते हुए कुरआन से तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने दारा के जीवन और मृत्यु पर भी बात की।


सत्र का अंतिम और तीसरा पेपर प्रो. तलहा रिजवी बर्क ने पढ़ा उनके पेपर का शीर्षक ‘इस्लामी तसव्वुफ और दारा शिकोह’ था। उन्होंने अपने पेपर की शुरूआत एक शेर से की और कुरआन की आयत भी पढ़ी। तसव्वुफ को परिभाषित करते हुए आपने कई फारसी के शेर पढ़े। उन्होंने दारा के इस्लाम और हिन्दू धर्म के अध्ययन पर प्रकाश डाला। दोनों धर्मों की उन विशेषताओं पर चर्चा की जो राष्ट्रीय एकता के लिए रोशनी साबित होते हैं। इसके बाद सत्र के अध्यक्ष प्रो. शरीफ हुसैन कासमी ने अध्यक्षीय वक्तव्य बहुत संक्षेप में दिया। उन्होंने प्रो. सलमा महफूज से गुजारिश की कि सिर्रे अकबर के प्रथम पांच पृष्ठों के अनुवाद पर फारसी विद्वानों से अवलोकन करवाएं।


प्लीनरी सत्र : 10 अक्टूबर 2019, 10:00 बजे से 11:00 बजे तक


यह सत्र एक घंटे का था। सत्र का संचालन कार्य डा. शाजिया उमैर ने संभाला। पहला पेपर सीरीया से आए अमर हसन ने अंग्रेजी भाषा में पढ़ा। उन्होंने साझा भारतीय संस्कृति और दारा शिकोह की आवश्यकता पर बात की। उनकी बात से पता चला कि दारा और भारतीय साझा संस्कृति का संबंध प्राकृतिक था। उन्होंने दारा के सामाजिक सोच पर आधारित जीवन का अवलोकन किया। सूफी समाज से दारा की निकटता पर प्रकाश डाला और दारा के जीवन पर बात की और कादरिया सिलसिले से उसके संबंध पर रौशनी डाली। दारा के कामों का जिक्र करते हुए उन्होंने दारा की मानवीय भावनाओं पर भी बात की। रामचंद्र और वशिष्ठ के ख्वाब के बारे में भी चर्चा की। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम तसव्वुफ, भक्ति, वहदतुल वजूद,उस समय की राजनैतिक परिस्थितियां और हिन्दू मुस्लिम एकता पर रौशनी डाली। उन्होंने दारा का रूहानियत से संबंध बताया तो औरंगजेब की सत्ता के लिए दिलचस्पी भी बयान की।


दूसरा पेपर केरल से आए डा. अताउल्ला संजरी ने पढ़ा। उन्होने कुरआन के सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की। मुगल शासन के संदर्भ में मुश्ताक यूसुफी और इकबाल के बारे में कहा कि ‘‘भाइयों का सा सुलूक करूंगा यानी चुन चुन कर कत्ल करूंगा’’। उन्होंने विकीपीडिया की अहमियत पर रोशनी डालते हुए इससे लाभ उठाने की बात कही।


तीसरा सत्र: 10 अक्टूबर 2019, 11:15 बजे से 1:00 बजे तक


तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. अख्तरूल वासे ने की जबकि संचालन कार्य डा. मुहम्मद काजिम ने संभाला। पहला शोध पत्र मुश्ताक अहमद तिजावरी ने पढ़ा उनके पेपर का विषय ‘ दारा शिकोह और हजरत मिया मीर ’ था। उन्होंने गौतम बुद्ध और दारा की वैचारिकता में एकरूपता की तरफ भी इशारा किया। इतिहास की ये दो हस्तियां ऐसी हैं जिन्होंने सत्ता का मोह छोड़कर और ऐशो आराम को छोड़कर दर बदरी की जिंदगी पसंद की। दारा ने मिया मीर से तीन मुलाकातें की और खतों के माध्यम से विचार विमर्श जारी रखा। उन्होंने अपने पेपर में दारा की सूफियों पर श्रद्धा विशेष तौर पर मियां मीर की विस्तार से चर्चा की साथ ही मुल्ला शाह का भी वर्णन किया। दारा की शायराना खूबी का बयान करते हुए मिया मीर की श्रद्धा में कादरी उपनाम रखने की भी बात पेपर में कही गई। दारा शिकोह की कुछ कुरआनी आयतों के अनुवाद की भी बात कही।


दूसरा पेपर प्रो. अखलाक आहन ने ‘ मुश्तरका हिन्दुस्तानी रिवायात और दारा शिकोह ’ विषय पर पेपर प्रस्तुत किया। उनका बल दारा की साहित्यिक सेवाओं पर था। उन्होंने साझा भारतीय परम्पराओं के संदर्भ में दारा शिकोह के साहित्य का अवलोकन किया। खास तौर पर दारा की रूबाइयों पर बात की और उमर खयाम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि रूबाई के कारण ही दारा की अलग पहचान है, दारा पूरी फारसी रिवायत में अपनी रूबाई गोई के कारण अद्वीतिय हैं। प्रो. अखलाक ने पश्चिम में भारतीय धर्मों की पहुंच का जरिया दारा शिकोह को बताया। दारा की गजलों और रूबाइयों का भी पेपर में वर्णन किया गया। इसके बाद तीसरा पेपर अलीम अशरफ जायसी ने पढ़ा जो हैदराबाद से आए थे। उन्होंने अपने पेपर को तीन भागों में बांटा था। पहले भाग में दारा के जीवन पर चर्चा की दूसरे भाग में तसव्वुफ पर बात की और तीसरे भाग में सूफियों पर बात की और मौलाना अबुल कलाम आजाद का हवाला दिया। आपने अपने पेपर में दारा की फर्जी अंगूठी की कहानी पर प्रकाश डाला और बताया कि वह केवल किस्से कहानी तक ही सीमित है वास्तव में इसका कोई प्रमाण नहीं है। दारा पर नास्तिक होने की बात को रद्द करते हुए उन्होंने कहा कि दारा शरीयत के खिलाफ कभी नहीं था। अलीम अशरफ जायसी ने ने वहदतुल वजूद पर बहुत सार्थक चर्चा की। मुल्ला शाह की प्रशंसा करते हुए उन्होंने शेर प्रस्तुत किए। उन्होंने दारा के दौर पर चर्चा करते हुए अपनी बात समाप्त की। इसके बाद अंतिम पेपर प्रो.अब्दुल कादिर जाफरी ने ‘दारा शिकोह और मस्ले वहदतुल वुजूद ’ विषय पर प्रस्तुत किया। इनका पेपर तसव्वुफ की अहमियत और जरूरत पर आधारित था। आपने तसव्वुफ के सिलसिले में कादरिया सिलसिले को अहमीयत दी। इन्होंने संास रोकने के योग पर भी प्रकाश डाला। प्रो.अब्दुल कादिर जाफरी का पेपर मुहिब्बुल्ला इलाहबादी वहदतुल वजुद, वदतुल शहूद, औरंगजेब का दौर और दारा शिकोह के हिन्दू धर्म के अध्ययन पर आधारित था। जाफरी साहब के अनुसार दारा का अस्ल मकसद हिन्दू मुसलमानों के बीच खाई को पाटना था। जो काम अकबर ने किया था सत्य की पहचान में लफ्जों के सिवा कोई अंतर नहीं है। जाफरी साहब ने मजमउल बहरैन की अहमियत पर प्रकाश डाला। बाबा लाल के बातचीत पर विचर व्यक्त किए और कहा कि दारा ने तसव्वुफ ओ इलाहियात पर बड़ी गहराई से अध्ययन किया था। प्रो. अख्तरूल वासे ने अध्यक्षीय वक्तवय में कहा कि अमीर खुसरो के बाप तुर्क थे लेकिन मां भारतीय थीं। दारा ने वाद विवाद के दौर में संवाद की बुनियाद रखी, धार्मिक स्वतंत्रता खुदा की देन है, हर किसी को अपना धर्म अपनाने की स्वतंत्रता है। मिया मीर की भारत में बड़ी अहमियत है। दारा शिकोह इसी परम्परा से जुड़े थे। वहदतुल वुजूद और वहदतुल शहूद,इस्लाम और हिन्दू धर्म में भी मौजूद है। अंत में उन्होंने बहादुर शाह जफर का एक शेर पढ़ा-

जफर आदमी उसको न जानिएगा वो हो कितना ही साहिबे फहमो जिका

जिसे ऐश में यादे खुदा न रही जिसे तैश में खौफे खुदा न रहा।

चैथा सत्र: 10 अक्टूबर 2019, 1:30 बजे से 3:00 बजे तक


चैथे सत्र की अध्यक्षता प्रो. सैयद हसन अब्बास ने की जबकि संचालन कार्य मुईन शादाब ने संभाला। पहला शोध पत्र डा. महशर कमाल ने ‘ हिन्दुस्तान में फिरकावाराना हमआहंगी मजमउल बहरैन की रौशनी में’ प्रस्तुत किया। डा. महशर कमाल ने अपने पेपर में दारा शिकोह के द्वारा इजाद की गई शब्दावली का जिक्र किया। नंबर एक मजहबे बरहके सूफिया और दूसरा दो मजहब मौहीद्दाने हिन्द। डा. महशर कमाल के शब्दों में इस्लाम और दूसरे धर्मों में अगर अंतर है तो उसके कारण हैं सामाजिक भेद, इस्लाम और दूसरे धर्मों में जो खाई है दारा ने उसे भरने की कोशिश की। मजमउल बहरैन की रचना का मकसद दोनों धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन के बाद उसके साझा बिन्दुओं की निशानदेही करना था।


इसके बाद प्रो. इराक रजा जैदी ने अपने पेपर में दारा की ऐसी रूबाइयों का जिक्र किया जिनमें उमर खय्याम के विषय मिलते हैं। दारा ने अपनी रूबाइयों में शहंशाह अकबर के सुलेह कुल के विचार को जगह दी। उन्होंने जगह जगह कुरानी आयतों के उदाहरण दिए उनके शब्दों में दारा शिकोह की रूबाइयां बहरे दरिया और कतरा के इस्तियारे से भरी हुई हैं। अंत में उन्होंने इकबाल की नज्म रमूजे खुदी और रमूजे बेखुदी का उदाहरण दिया।


अध्यक्षीय वक्तव्य में सैयद हसन अब्बास ने दारा शिकोह का एक शेर सुनाया और सभी पेपर पर अपनी राय रखते हुए कहा कि विजेता का इतिहास लिखा जाता है पराजित का नहीं।


पांचवां सत्र


पांचवें सत्र की अध्यक्षता प्रो. सैयद एनुल हसन ने की जबकि संचालन कार्य गजाला फातिमा ने संभाला। पहला शोध पत्र पद्मश्री डा.नाहिद आबिदी ने हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया। उनका पेपर एकता और इत्तेहाद, तुलनात्मक अध्ययन ,दारा और औरंगजेब के रवैए, कादरी सिलसिले, पश्चिम देशों में दारा शिकोह की रचनाओं के अनुवाद और दारा शिकोह के दर्शन वहदतुल वजूद पर आधारित था। उन्होंने उपनिषद पर अपने विचार रखते हुए फारसी और संस्कृत के अनुवादों पर बात की। शंकराचार्य के संदर्भ में उपनिषद की विवेचना की। प्रो. मुहम्मद हबीब का पेपर वर्तमान समय में दारा का महत्व पर केंद्रित था। उनके अनुसार सूफी आंदोलन, भक्ति आंदोलन, इस्लाम, अकबर का धर्म और राजनीतिक जरूरत को महत्व इन सभी तरीको से सत्य को पहचानने का प्रयास है। एकता का अर्थ यह नहीं होता कि अपने धर्म व ईमान को छोड़कर दूसरे के साथ हो जाएं। उनका पेपर मुस्लिम हुकूमतों, मुस्लिम सभ्यता और इस्लाम पर प्रकाश डालता है।


अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. सैयद एनुल हसन ने दारा शिकोह और बनारस के संबंध में कुछ सूचनाएं दीं। उन्होंने बताया कि बनारस में दारा शिकोह के नाम की एक मस्जिद भी है, एक मुहल्ले का नाम भी दारा के नाम से जाना जाता है। वहीं एक दारा शिकोह कटरा भी है। प्रो. सैयद एनुल हसन ने दारा की व्यस्तता के बावजूद उसकी रचनात्मक सेवाओं की प्रशंसा की। उन्होंने दांते, शैले, और रूमी पर जानकारी उपलब्ध कराई।


कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के निदेशक डा. शेख अकील अहमद ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का शुक्रिया अदा किया। मुख्य रूप से आर एस एस के संयुक्त महासचिव डा. कृष्ण गोपाल, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तारिक मंसूर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया की कुलपति प्रो. नजमा अख्तर, राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के उपाध्यक्ष प्रो. शाहिद अख्तर, अलीगढ़ विश्वविद्यालय के विधि संकाय के प्रो. शब्बीर अहमद, प्रो. आजुरमी दुख्त सफवी, प्रो. तलहा रिजवी बर्क, प्रो. सलमा महफूज, प्रो. सैयद मुहम्मद अजीजुद्दीन और अन्य सभी अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

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