ट्रिपल तलाक बिल और लैंगिक न्याय

'ट्रिपल तलाक बिल’ महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा के संबंध में ऐतिहासिक फैसलों में से एक है। जो दमनकारी धार्मिक प्रथाओं के खिलाफ उनकी ढाल बनेगा।





बेबी तबस्सुम


मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक को विवाह संस्था का सबसे घृणित पहलू माना जाता है। तलाक एक बुराई है जहाँ तक संभव हो इसे टाला जाना चाहिए। लेकिन कभी-कभी ये बुराई एक आवश्यकता बन जाती है। इस्लामिक विचारक जफ़र हुसैन बताते है कि मुस्लिम विधि में विभिन्न विधाओं के माध्यम से विवाह को विघटित किया जा सकता है, जिसमें तलाक-उल-बिद्द्त (ट्रिपल तलाक) का उपयोग आमतौर पर मुस्लिम पतियों द्वारा किया जाता है। पति अपनी इस शक्ति का मनमाने ढंग से उपयोग कर सकता है। जस्टिस वी.आर.कृष्णा अय्यर का कहना है कि मुस्लिम पति को अपने पर्सनल लॉ के तहत तत्काल तलाक देने के लिए मनमानी और एकतरफा शक्ति प्राप्त करता हैं। इस तरह के प्रावधान पत्नी के अधिकारों का हनन करने वाले है।


पारंपरिक हनाफी कानून के तहत तलाक-ए-बिद्दत में पति द्वारा तलाक के तीन शब्दों के उच्चारण के साथ ही तलाक प्रभावी तथा अप्रतिसंहरणीय बन जाता है। यदि वे एक-दूसरे से पुन: विवाह करना चाहे तो महिला को हलाला की प्रक्रिया से गुज़रना होगा। इस तरह का अमानवीय कार्य उनके मानवाधिकारों का हनन और लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाला है।


उपरोक्त परिदृश्य में 'ट्रिपल तलाक बिल’ महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा के संबंध में ऐतिहासिक फैसलों में से एक है। जो दमनकारी धार्मिक प्रथाओं के खिलाफ उनकी ढाल बनेगा। यह कानून मुस्लिम पुरुषों को उनकी पत्नियों के खिलाफ प्रभुत्व की सर्वोच्च शक्ति देने वाली अनुचित 'तलाक-ए-बिद्दत' प्रथा को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है। यह महिलाओं को सशक्त बनाने उन्हें उनके भेदभावपूर्ण सांस्कृतिक रीति-रिवाजों की बेड़ियों से आजाद कराने में एक न्यायोचित निवारक है। भारतीय संसद ने इस विधेयक के माध्यम से 'तलाक-ए-बिद्दत' को असंवैधानिक और अवैध घोषित करके लैंगिक न्याय को सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह मुस्लिम महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का सजग प्रहरी हैं।


यह प्रथा भले ही पुरातन समय से चली आ रही हो। लेकिन इसका उल्लेख कुरान और शरीयत में नहीं है। इस्लामिक विद्वानों का कहना है कि कुरान का सूरह 4 आयत 35 स्पष्ट रूप से तलाक देने की प्रक्रिया को बताता है। इसमें दोनों के बीच सामंजस्य पैदा करने के लिए तीन माह की प्रतीक्षा अवधि तय की गई है। सर्वप्रथम पति-पत्नी को समझाने का विधान है। एक पंच पुरुष पक्ष से एक महिला पक्ष से नियुक्त करों। इसके बाद सुलह के प्रयास विफल होने पर उनको तुहर काल (मासिक स्राव से पाक होने पर) में तलाक देने का आदेश है। अगले तुहर काल में दूसरा तलाक कहा जाये। पहले सुलह के प्रयास किये जाये और प्रयास असफल होने पर तीसरी तलाक देकर पत्नी को इद्दतअवधि पूरी करने के लिए छोड़ दिया जाये। इसे ‘तलाक-ए-हसन’ के नाम से जाता है।


इसके अलावा तलाक के अन्य प्रकारो ‘तलाक-ए-अहसन’, ‘इला’, ‘लियान’, ‘जिहार’, ‘फस्क’, ‘मुबारत’ का भी जिक्र है। कृष्णा अय्यर का कहते है कि यह बहुप्रचलित भ्रम है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ पति को विवाह-विच्छेद का निरंकुश अधिकार देता है। इस्लामिक विचारक सैय्यद खालिद रशीद का कहना है- इस्लाम पहला धर्म है जो पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी समानता प्रदान करता है। ‘खुला’ तलाक महिलाओं को भी तलाक लेने का अधिकार देता है। तलाक-ए-तफवीद एक प्रकार का प्रत्यायोजित विवाह-विच्छेद है। मुबारत में पारस्परिक सहमति के द्वारा तलाक लेने का अधिकार प्राप्त है। इस प्रकार के प्रावधान दिखाते है कि इस्लामिक सिद्धांत पूर्णतया लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय पर आधारित है।


सायरा बानों बनाम भारतीय संघ (2017) वाद में ‘ट्रिपल तलाक’ प्रथा को चुनौती दी गयी। याचिकाकर्ता द्वारा पति द्वारा दी गई तीन तलाक को शून्य किये जाने की मांग की गई। ऐसा तलाक अचानक, एकतरफा और अप्रतिसंहरणीय रूप से विवाह के संबंधों को समाप्त करता है। साथ ही संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद-14, 15, 21 का उल्लंघन करता है। अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने 'तलाक-ए-बिद्दत' पर 3:2 बहुमत का फैसला सुनाते हुए। इस प्रथा को अमान्य और असंवैधानिक करार दिया। न्यायालय ने सरकार व अन्य राजनीतिक दलों से अपने मतभेदों को दरकिनार रखते हुए छ: माह में इस पर कानून बनाने को कहा। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि मुस्लिम समुदाय के जो अपने विश्वास, रीति-रिवाज व परम्पराएं हैं, उन सारी चीजों को ध्यान में रखकर संसद कानून बनाएगी। साथ ही इस निर्णय ने देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने की चर्चा के द्वार फिर से खोल दिए।


किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद भी ट्रिपल तलाक के कई मामले सामने आये। रामपुर (यूपी) में ही ट्रिपल तलाक के कई केस देखने को मिले। रामपुर के अजीमनगर की गुल अफशां बनाम कासिम मामलें में पत्नी को तीन तलाक़ से इसलिए घोषित कर दिया गया क्योंकि वह सुबह देर से सोकर उठी, टांडा जिले की आयशा बनाम कासिफ मामलें में दहेज की मांग के चलते तीन तलाक दिया गया। वहीं अन्य मामलें में पत्नी के काले रंग की वजह से उसे तलाक दे दिया गया। मुंबई की मदीना सैय्यद को भी पति अनवर द्वारा तीन तलाक दिया गया। अत: सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और पीड़ितों की शिकायतों का निवारण करने हेतु कानून बनाने की जरूरत महसूस हुई। परिणामस्वरुप लैंगिक समानता और न्याय की दिशा में अहम कदम उठाते हुए मुस्लिम महिला (विवाह के अधिकार पर संरक्षण) विधेयक 2019 को पारित किया गया। इस कानून से लैंगिकता के बड़े संवैधानिक लक्ष्यों को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।


इस विधेयक में तलाक-ए-बिद्दत, लिखित या इलैक्ट्रॉनिक रूप में तलाक देने को शून्य और अवैध घोषित किया गया है। इसे मात्र तीन तलाक का उच्चारण करने पर तीन वर्ष के कारावास और जुर्माने के साथ दंडनीय अपराध माना गया है। इसमें ट्रिपल तलाक़ को संज्ञेय अपराध मानते हुए बिना वारेंट के गिरफ़्तारी का प्रावधान है। इसके तहत मुस्लिम महिला जिसको तीन तलाक दिया गया है, पति से अपने और आश्रित बच्चों के लिए भरण-पोषण पाने की हकदार है। महिला को नाबालिग बच्चों की कस्टडी लेने का प्रावधान है। इस प्रकार इस तरह के प्रावधानों ने मुस्लिम महिलाओं को मौलिक संरक्षण प्रदान करके उनके सशक्तिकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


इसके साथ ही यह बिल विवादों से भी घिरा हुआ है। मुस्लिम धार्मिक संगठनों जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमियत उलेमा-ए-हिन्द ने इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग की उनका कहना है कि इसका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा के बजाय मुस्लिम पतियों को दंडित करना है। इस कानून के जरिये सिर्फ मुस्लिमों में विवाह और तलाक के मामलों में आपराधिक प्रावधान लाए गए हैं। जबकि दूसरे धर्म में वे अभी भी एक नागरिक मामला हैं। यह कानून भेदभावपूर्ण और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला है। इसके साथ ही इसकी सबसे बड़ी आलोचना रखरखाव के प्रश्न को लेकर रही है कि अगर पति जेल में है तो पत्नी को रखरखाव कैसे प्रदान करेगा? यह कानून वित्तीय सुरक्षा के बारे में स्पष्ट नहीं बताता है। इसके अलावा पति को जेल भेजने के बाद पत्नी को उसके वैवाहिक परिवार की दया पर छोड़ दिया जाता है, जो पति को सलाखों के पीछे डालने के लिए उसके प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर सकते हैं। इस कानून में पति-पत्नी के बीच किसी भी तरह का समझौता कराने का प्रावधान नहीं है। पति के कारावास से सुलह मुश्किल हो सकती है। इस बिल में इस्लामिक मूल्यों को शामिल नहीं किया गया है। इस प्रकार यह कानून न तो शादी को बचाता है, न ही महिला को न्याय देता है, उसे सशक्त बनाना तो छोड़ दें।


इन सब आलोचनाओं के बावजूद इसकी उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता कि इसने महिलाओं को नाबालिग बच्चो की कस्टडी का अधिकार देकर उनको न्याय प्रदान किया है। शरीयत कानून के अनुसार जब बच्चा सात वर्ष का हो जायेगा पति उसको लेकर जा सकता है। जबकि वो सात वर्ष बहुत अहम होते है, जब माँ पूरी मेहनत करके उसे बड़ा करती है। इससे जो महिलाओं के साथ नाइंसाफी होती थी कानून के जरिये उस पर अंकुश लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस बिल के जरिये ऐतिहासिक गलत को सही करने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार इस कानून ने ट्रिपल तलाक को समाप्त कर समाज में लैंगिक समानता, लैंगिक न्याय और लैंगिक सशक्तिकरण हासिल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


(एम.फिल. शोद्यार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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