केंद्र-राज्य संबंध : कोविड-19 परिदृश्य के दौरान सहकारी संघवाद का सुदृढ़ीकरण

वर्तमान समय में जब देश कोविड महामारी के चुनौतीपूर्ण हालातों का सामना कर रहा है तो स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और राज्य संबंधों के बीच सहयोग और समन्वय महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं।



बेबी तबस्सुम


भारत का संविधान सरकार के अर्ध-संघीय रूप का अनुसरण करता है। संविधान के भाग-XI में शक्तियों को केंद्र और राज्यों के बीच विधायी (अनुच्छेद 245-255), प्रशासनिक (अनुच्छेद 256-263) और वित्तीय (अनुच्छेद 264-293) संबंधों के तहत विभाजित किया गया है। हालाँकि दोनों अपने-अपने क्षेत्राधिकार में प्रमुख हैं। यघपि, संविधान राज्य के प्रशासन के मामलों में राज्य विधायिका पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए संघ को अधिकार प्रदान करता है। आपातकाल (1975) के दौरान इस पर सवाल उठायें जाते हैं क्योंकि केंद्र द्वारा अधिक शक्तियों का प्रयोग किया जाता है। सरकारिया आयोग (1983) ने केंद्रीकृत नियोजन को आवश्यक मानते हुए राज्यों की स्वायत्ता पर भी बल दिया। आलोचकों द्वारा तर्क दिया जाने लगा कि भारत को शक्तिशाली केंद्र की आवश्यकता नहीं है, राज्यों को व्यावहारिक धरातल पर स्वायत्ता प्राप्त होनी चाहिए। परिणामस्वरुप सहकारी संघवाद की अवधारणा को अपनाया गया, जो केंद्र व राज्यों के मध्य वित्तीय एवं प्रशासनिक सहयोग एवं समन्वय पर बल देता है।


वर्तमान समय में जब देश कोविड महामारी के चुनौतीपूर्ण हालातों का सामना कर रहा है तो स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और राज्य संबंधों के बीच सहयोग और समन्वय महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं। दुनिया भर में कोविड महामारी ने स्वास्थय और प्रशासनिक सहयोग के क्षेत्र में संघीय संरचाओं को परीक्षण श्रेणी में रखा है। प्रख्यात राजनीतिक शास्त्री रेखा सक्सेना का कहना है कि कोविड-19 के प्रकोप पर भारत की प्रतिक्रिया की प्रमुख विशेषता केंद्र और राज्य सरकारों के बीच घनिष्ठ सहयोग और समन्वय रहा है। भारत के संविधान में स्वास्थ्य सेवा की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई है। वहीं संविधान असाधारण परिस्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार को राज्यों के बीच सहयोग व समन्वय के लिए नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का शक्ति प्रदान करता है। महामारी रोग अधिनियम (1897) और आपदा प्रबंधन अधिनियम (2005) हस्तक्षेप करने के लिए वैधानिक ढांचा प्रदान करते है।


महामारी रोग अधिनियम बीमारियों के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए दोनों सरकारों को संवैधानिक रूप से मजबूती प्रदान करता है। यह अधिनियम केंद्र को प्रवेश और निकास बंदरगाहों पर महामारी रोगों के संबंध में निवारक कदम उठाने के लिए सशक्त करता है। साथी ही यह राज्य सरकारों को अपने अधिकार-क्षेत्र के भीतर महामारी संबंधी बीमारियों के प्रसार को रोकने के लिए निवारक और विनियामक उपाय करने का भी अधिकार देता है। कर्नाटक राज्य इस अधिनियम को लागू करने वाला पहला राज्य बना। इसके कुछ समय बाद ही हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और गोवा राज्यों ने इसे अपनाया। यहाँ यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य का राज्य के क्षेत्राधिकार का विषय होने बावजूद, इस अधिनियम के कार्यान्वयन के संबंध में केंद्र और राज्यों के बीच कोई हितों का टकराव नहीं है।


इसके साथ ही प्रसाशनिक मामलों व केंद्रीय दिशा निर्देशों को मानने भी सहयोग दिखाई दिया है। 21 दिनों के लॉकडाउन के पहले दौर के दौरान, 'द इकोनॉमिक्स टाइम्स' (11 अप्रैल 2020) की रिपोर्ट के मुताबिक बदायुं (यूपी) में कथित तौर पर, 568 लोगो को गिरफ्तार किया गया। लॉकडाउन के उल्लंघनकर्ताओं से जुर्माने के रूप में एक अच्छी रकम को वसूल किया गया। पुलिस, सार्वजनिक स्थानों की निगरानी करते समय लाठीचार्ज और उल्लंघनकर्ताओं की पिटाई करते हुए देखी गई ताकि उनके मन में डर पैदा हो। इस प्रकार हम विभिन्न राज्यों को केंद्रीय कानूनों और दिशानिर्देशों का अनुपालन करते हुए देख सकते हैं।


जिला प्रशासन कोविड-19 के प्रकोप और इसके प्रबंधन में भी सक्रीय रहा है। भीलवाड़ा (राजस्थान) जिले और आगरा (यूपी) शहर प्रशासन के पहल और प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भीलवाड़ा शुरू में भारत में सबसे अधिक प्रभावित कोविड-19 जिले में से एक बन गया। लेकिन 30 मार्च के बाद कोई नया मामला सामने नहीं आया। 2.2 मिलियन से अधिक लोगों की कई बार स्क्रीनिंग की गई। केंद्र सरकार को देशभर में विशेष रूप से सबसे अधिक प्रभावित जिलों में इसकी रोकथाम के लिए 'भीलवाड़ा मॉडल' को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। वहीं आगरा शहर प्रशासन के मामलों को वर्गीकृत करने में कठोर रणनीति, कठोर परीक्षण, डोर-टू-डोर सर्वेक्षण करना और कठोर क्वारंटाइन प्रक्रियाएं प्रभावी साबित हुई हैं जो सहकारी संघवाद की भावना को इंगित करते हैं।


संकट के प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए उपायों के साथ-साथ कुछ राज्यों ने कोविड से निपटने के लिए नए नवाचारों को अपनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबो को स्वास्थय सेवा का लाभ देने हेतु 'प्रधानमंत्री जन-आरोग्य योजना' की शुरुआत की। डेलॉइट इंडिया की सहयोगी अनुपमा जोशी 'द इकोनॉमिक टाइम्स' में बताती है कि राष्ट्रीय स्तर पर आरोग्य सेतु, तमिलनाडु का कोविड-19 क्वारंटाइन मॉनिटर, केरल की मोबाईल टेस्टिंग यूनिट बंधु, महाराष्ट्र का महाकवच, 24X7 चैटबॉट और कॉल सेंटर में तैनात कर्मचारी और टेलीमेडिसिन ऐप्स ने स्वास्थय सेवा प्रदान करने की चुनौतियों से निपटने में मदद की है। कम से कम 2,000 स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता प्रकोप से लड़ने में लगातार काम कर रहे हैं। 3,000 से अधिक आशा (ASHA-Accredited Social Health Activist) को 160,000 से अधिक शहर के निवासियों की घर-घर निगरानी में मदद करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।


लेकिन इसके साथ ही हम दोनों के हितों के मध्य संघर्ष भी देख सकते हैं। लॉकडाउन के तीसरे चरण में भारत के सभी जिलों को तीन रंगों- ग्रीन, ऑरेंज और रेड ज़ोन में विभाजित किया गया। राज्यों ने इस तरह के वर्गीकरण में अधिक स्वायत्ता की मांग की है। केंद्र सरकार की तरफ से जो नए दिशानिर्देश जारी किए गए थे वह कुछ राज्यों के हितों को पूरा नहीं कर रहे थे। उदाहरण के लिए- छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश भाघेल केंद्रीय मंत्री से राज्य की राजधानी रायपुर को 'रेड जोन' सूची से हटाने का अनुरोध किया। ‘बिजनेस इनसाइडर’ की रिपोर्ट के मुताबिक (1 मई 2020) उन्होंने डॉ. हर्ष वर्धन को जानकारी दी कि राज्य में केवल 43 कोरोना पॉजिटिव केस पाये गए थे, जिनमें 36 ठीक हो गए हैं। हाल में ही रायपुर के रेड जोन में जो मामला सामने आया वह एम्स अस्पताल की नर्सिंग अधिकारी का था। रायपुर में केवल एक सक्रिय मामला है। इसलिए इसे रेड जोन से हटा दिया जाना चाहिए।


इस प्रकार महामारी से लड़ने के लिए दोनों के बीच कई मुद्दों पर तनाव देखा गया। लगभग तीन वर्ष पूर्व, स्वास्थय मंत्रालय ने 'प्रिवेंशन, कंट्रोल एंड मैनेजमेंट ऑफ एपिडेमिक, बायो-साइकोलॉजिकल ओप्प्रेशन एंड डिजास्टर बिल 2017' के मसौदे पर बातचीत की थी। जिसमें केंद्र और राज्य को स्वास्थय संबंधी संकट से निपटने के लिए उनके कार्यों और दायित्वों का उल्लेख किया गया है। किंतु इस संकट की घड़ी में में किसी भी मामलें को इस बिल के प्रकाश में नहीं देखा गया। इस तरह महामारी ने सहकारी संघवाद को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है क्योंकि सरकार के किसी अकेले क्षेत्राधिकार या स्तर के पास इस संकट से निपटने की क्षमता नहीं हैं । इसके लिए तीनों स्तर की सरकारों के बीच सहयोग व समन्वय अत्यंत आवश्यक है। कोविड-19 महामारी से निपटने और सहकारी संघवाद की भावना को मजबूत करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।


हालाँकि इस दौरान उपजी अन्य समस्यायों से निपटने में दोनों के मध्य अच्छा तालमेल भी देखने को मिला जैसे- खाद्य वितरण, प्रवासी श्रमिक समूह, राहत शिविरों की व्यवस्था आदि। वित्तीय संकट से निपटने के लिए राज्यों की तरफ से भी पहल की गई। केरल राहत पैकेज (2.2 बिलियन अमरीकी डॉलर) को देने वाला पहला राज्य बना। केंद्र सरकार ने एक सप्ताह बाद 22.6 बिलियन अमरीकी डॉलर के वित्तीय सहायता की घोषणा की। वहीं राज्य में कोरोनावायरस के मामले सामने आने से पहले ही ओडिशा ने सक्रिय कदम उठाए। लगभग आधे से अधिक राज्यों में विभिन्न क्षेत्रीय दलों का शासन होने के बावजूद महामारी के बहुआयामी प्रभावों का मुकाबला करने के लिए केंद्र-राज्य दोनों सरकारों ने अपने वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर देश भर में लोगों और वस्तुओं की आवाजाही की निगरानी और विनियमन में प्रभावी समन्वय की भूमिका का परिचय दिया। यह सभी उदाहरण सहकारी संघवाद को मजबूती प्रदान करते हैं।


((Baby Tabassum is an Intern with Acdemics4Nation. She is currently doing MPhil from Delhi University.)


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