उत्तर-औपनिवेशिक भारत में बहुपक्षीय सामाजिक और कानूनी परिदृश्य में लैंगिक न्याय

'मुस्लिम वूमेंस कुएस्ट फॉर जस्टिस' लखनऊ शहर में स्थित कई मुस्लिम महिला संगठनों का एक नृवंशविज्ञान अध्ययन है जिसमें सूक्ष्म स्तर की संस्थागत पारस्परिक व्यवहार और न्याय एवं समानता की रोजमर्रा की समझ पर नजदीकी से ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया गया है



बेबी तबस्सुम


यह पुस्तक कुछ घंटों, दिनों, सप्ताहों और महीनों के गहन अध्ययन, विश्लेषण और शोध का नहीं अपितु मुस्लिम महिला कार्यकर्ताओं, पादरियों, वकीलों, वादियों और रोजमर्रा की समझ रखने वाले लोगों के साथ अत:क्रिया का परिणाम है। 'मुस्लिम वूमेंस कुएस्ट फॉर जस्टिस' लखनऊ शहर में स्थित कई मुस्लिम महिला संगठनों का एक नृवंशविज्ञान अध्ययन है जिसमें सूक्ष्म स्तर की संस्थागत पारस्परिक व्यवहार और न्याय एवं समानता की रोजमर्रा की समझ पर नजदीकी से ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया गया है। यह नीति निर्माताओं, कानूनी अधिवक्ताओं, मानव और महिला अधिकार समूहों के द्वारा स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लैंगिक न्याय की प्राप्ति के जमीनी स्तर के समाधान खोजने के लिए समर्पित है। पुस्तक के केंद्र में तीन मुस्लिम महिला कार्यकर्त्ता नाइश हसन, शहनाज़ सिदरत और शाइस्ता अंबर ज्ञान उत्पादन में सन्निहित आयामों के माध्यम से इस्लाम में महिलाओं के वैकल्पिक प्रतिनिधित्व के प्रस्तावों की संभावनाओं के रूढ़िवादी पादरियों के एकाधिकार की व्याख्या को चुनौती देती हैं। यह जमीनी स्तर पर मुस्लिम महिलाओं के सक्रियता की विविधता के अध्ययन के लिए एक तुलनात्मक लेंस प्रदान करती है। पुस्तक में राज्य कानून और गैर-राज्य कानून के बीच के द्विविभाजन को चुनौती दी गयी है। अत: यह पुस्तक उत्तर-औपनिवेशिक भारत में बहुपक्षीय सामाजिक और कानूनी परिदृश्य के भीतर लैंगिक न्याय के लिए महिलाओं के संघर्ष पर गहन 'नृवंशविज्ञान अध्ययन' संबंधी निरीक्षण को चित्रित करते हुए एक मील के पत्थर रूप में उभरती है।


भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम पारिवारिक कानूनों में सुधारों पर होने वाली बहस सदैव राजनीतिक दृष्टि से हुई है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में जारी विवाद लंबे समय से तथ्यों पर कम अक्सर खंडनात्मक और वैचारिक पदों पर रहा है। इस सन्दर्भ में 'मुस्लिम वूमेंस कुएस्ट फॉर जस्टिस' सामाजिक-कानूनी सुधार की जमीनी स्तर पर चल रही पहलों को अनुभवजन्य छानबीन के माध्यम से इस विवादास्पद मुद्दे को संबोधित करती है। इस्लामिक ढांचे के भीतर लैंगिक न्याय की प्राप्ति के लिए अपने दावों को व्यक्त करने के लिए प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष महिला संगठन किस तरह से बातचीत करते हैं, यह दिखाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा विभिन्न प्रकार के वैचारिक और राजनीतिक दृष्टिकोणों को अभिव्यक्त करने वाली आवाज़ों की बहुलता कैसे इस्लामिक लैंगिक न्याय पर इस तरह के जमीनी स्तर के आंदोलन को आकार देती हैं। फिर भी, यह याद रखना चाहिए कि इस तरह के जमीनी स्तर के संघर्षों के कानूनी और वैचारिक सीमाओं के बीच एक विशद विभाजन और लचीलापन मौजूद होता है।


महिला अधिकारों पर विचारों और विमर्श का उत्पादन राज्य और इसकी कानूनी प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह पुस्तक मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के हाल ही में इस दिशा में नए सिरे से किए गए प्रयासों को उजागर करता है कि वे राज्य कानूनी प्रणाली के बाहर लैंगिक न्याय और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को फिर से व्यक्त करें। मुस्लिम महिला कार्यकर्त्ता इस्लाम में जेंडर और कामुकता के अर्थ को बहुलवादी नजरिये से व्याख्यित करने में योगदान देते है। इस प्रतिमान ने महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक न्याय की श्रेणियों की असमानता और जटिलता को राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से विखंडित दुनिया के भीतर देखने का प्रयास किया है।


यह पुस्तक छ: अध्यायों में विभक्त है। पुस्तक की शुरुआत उत्तर-औपनिवेशिक भारत में मुस्लिम महिला अधिकारों की सक्रियता की संक्षिप्त चर्चा से होती है। जो मानवाधिकारों, नारीवाद, कानूनी बहुलवाद और इस्लाम पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों की बहस के संबंध में हैं। न्याय प्राप्ति के अपने प्रयास में वे मुस्लिम महिलाओं का भारत के नागरिक के रूप में अधिकारों का दावा करने के लिए भारतीय संविधान और कुरान दोनों का सन्दर्भ देते है। लेखिका भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्त्ता नाइश हसन के वक्तव्य को उद्धरित करते हुए बताती है कि उनका कहना है कि उत्तर-औपनिवेशिक राज्य को एक धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से कुरान को संहिताबद्ध करने की आवश्यकता है। ताकि अदालतों में मुस्लिम पारिवारिक कानून की गलत व्याख्या को कम किया जा सके। (पृष्ठ-1) उनका यह वक्तव्य काफी विवादात्मक हैं क्योंकि हमें पवित्र कुरान को संहिताबद्ध करने की नहीं अपितु कुरान के आलोक में मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने पर बल देना है। इन महिलाओ ने सार्वजनिक स्थान के भीतर लिंग उपर्युक्त गतिविधियों की सीमाओं को सक्रिय रूप से उजागर किया है।


पुस्तक का दूसरा अध्याय ‘ए मल्टीडायमेंशनल एप्रोच टू मुस्लिम वूमेंस एक्टिविज़्म : मैपिंग द लीगल लैंडस्केप इन द सिटी ऑफ लखनऊ’ संस्थागत जटिलताओं और मेथोडोलॉजी को उजागर करता है। उनका यह कार्य बहु-पक्षीय नृवंशविज्ञान अध्ययन पद्धति पर आधारित है। इसके विभिन्न चरणों जैसे समस्या का चयन, साहित्य की समीक्षा, अनुमानों का सूत्रीकरण, नमूना चयन, डेटा एकत्रीकरण, डेटा का विश्लेषण और विवेचन आदि की चर्चा की गयी है। अध्ययन के अनुसंधान डिजाइन की रुपरेखा में गैर-प्रतिपक्ष अवलोकन, कथा साक्षात्कार, केस स्टडी और कानूनी दस्तावेजों के विश्लेषण को शामिल करती है। हालांकि यह अध्याय किसी भी नृवंशविज्ञान शोध पद्धति से भिन्न नहीं है। इस अध्याय के दूसरे भाग में संस्थागत परिदृश्य की एक ज्वलंत छवि को दर्शाया गया है। जिसके भीतर लखनऊ शहर में मुस्लिम महिला सक्रियता को अर्थ देने का प्रयास किया गया है। जिसका उद्देश्य सार्वजनिक रूप से एक समतामूलक राजनीतिक परिदृश्य के भीतर इस्लाम में महिलाओं की विषयपरकता के रूढ़िवादी आदर्शों को पलटना हैं।


इन कार्यकर्त्ताओं के अनुसार रूढ़िवादी व्याख्यायों को परंपरागत रूप से भारत के शक्तिशाली मुस्लिम धार्मिक प्राधिकारियों द्वारा अनुमोदित किया गया है। एक तरह की अंतर्दृष्टि एकत्र करने के लिए, कानून और लैंगिकता पर पारस्परिक दृष्टिकोण के आधार पर इन्होंने अपने शोध को तीन महिला संगठनों पर केंद्रित किया है। भारतीय मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड जिसकी स्थापना ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत 1937 में हुई जिसने एक सुधारवादी परिप्रेक्ष्य रखा। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (2005) जो कि एक धर्मनिरपेक्ष चेहरे को चिन्हित करता है। और बज़्मे ख़्वातीन (2007) जो रूढ़िवादी विचारों से ओत-प्रोत हैं। इन संगठनों का चयन यूँ ही नहीं किया गया है बल्कि मुक्ति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा अपनाये गए विशिष्ट विमर्श और रणनीति को अपनाने के कारणवश किया गया है। बज़्मे ख़्वातीन अपनी नीतिपरक गतिविधियों में लैंगिक परिप्रेक्ष्य को शामिल करके महिलाओं के नागरिक अधिकारों की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम वूमेन पर्सनल लॉ बोर्ड और भारतीय मुस्लिम महिला संगठन खुले तौर पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का विरोध करते हैं और राज्य से आह्वान करते है कि वे भारतीय नागरिक के रूप में मुस्लिम महिलाओं के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों का विस्तार करें।


शोध में लेखिका ने मुस्लिम पारिवारिक अदालतों को भ्रष्ट, कम आय वाले लोगों की शिकायतों के प्रति उदासीन, अविश्वसनीय और असक्षम पाया। पारिवारिक अदालत की एक मुस्लिम एडवोकेट ने संस्थान की तुलना 'मकड़ी के जाल' से करते हुए कहा कि गरीब लोग इसमें आसानी से फंस कर अपना धन और समय दोनों बर्बाद करते हैं। वहीं सामाजिक कार्यकर्त्ता और ऑल इंडिया मुस्लिम वूमेन पर्सनल लॉ बोर्ड की फॉर्मर सेक्रेटरी परवीन अबिदी पारिवारिक न्यायालयों की कानूनी प्रणाली की अक्षमता और भ्रष्टता की ओर इशारा करते हुए कहती है कि “इस परिप्रेक्ष्य में अगर महिला आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है तो उसके लिए न्याय पाना गंभीर चुनौती बनी हुई है”। इस तरह के दृष्टिकोण से विशेष रूप से इस्लाम की अनौपचारिक संस्थाएँ और कानून न्याय, नागरिक अधिकारों और प्रगति में एक अनुदारवादी बाधा के रूप में कार्य कर रहे हैं। इस संबंध में हमें संस्थागत परिदृश्य और कानून की जीवंतता और लचीलेपन को दर्शाने के लिए राज्य-समुदाय विरोधिता से परे देखने की आवश्यकता है।


तृतीय अध्याय 'डीस्टेबिलाइजिंग जेंडर्स प्रोप्रिएटिस : मुस्लिम वूमेन्स विजिबिलिटी विदइन द पब्लिक स्पेस' यह विश्लेषित करता है कि सार्वजानिक क्षेत्र किस तरह से पितृसत्तात्मकता से ग्रसित है। साथ ही यह महिला कार्यकर्त्ता निजी क्षेत्र के भीतर महिलाओं की अधीनता के मानदंडों के खिलाफ किस तरह से अपनी आवाज़ को बुलंद करती हैं। यह अध्याय मुस्लिम महिला कार्यकर्त्ताओं द्वारा इस्तेमाल किए गए सार्वजनिक स्व-प्रतिनिधित्व की बहु-रणनीतियों पर प्रकाश डालते हुए शक्ति के आयामों में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। जो समकालीन भारत में राजनीति, कानून और धर्म के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी को गहराई से आकार देते हैं। वह सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए निर्धारित मूल्यों, मानकों और पूर्वाग्रहों का पुरजोर तरीके से खंडन करती हैं। शहनाज़ सिदरत सार्वजनिक स्थानों में महिलाओं के संलग्न होने के अवसरों को इंगित करते हुए कहती है कि जब तक मुस्लिम महिलाएं पर्दे के नियमों का पालन करती हैं, वे सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने के लिए स्वतंत्र हैं। यहां पर्दे की प्रतीकात्मक भाषा का इस्तेमाल उनके सम्मान के प्रतीक के रूप में किया गया है जो शालीनता, विनम्रता और पवित्रता को व्यक्त करता है। लेखिका पर्दे और इस्लामिक शालीनता की व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा को स्वीकार करने के बजाय लैंगिकता प्रधानन्य विचारों का पुरजोरता से खंडन करते हुए उन्हें पुन:परिभाषित करने पर बल देती हैं। इस संदर्भ में लेखिका का तर्क है कि सार्वजनिक क्षेत्र में नारीत्व, स्वतंत्रता, समता और समानता के अर्थ ने इस्लाम की श्रेणियों और जमीनी स्तर पर महिलाओं के अधिकार की अस्पष्टता को उजागर किया है।


चतुर्थ अध्याय 'व्यइंग फॉर ए जेंडर जस्ट इस्लामिक मैरिज कॉन्ट्रैक्ट : वूमेन्स लीगल स्पेस' में लेखिका इस बात पर प्रकाश डालती है कि “ऑल इंडिया मुस्लिम वूमेन्स पर्सनल लॉ बोर्ड”, “बज़्में ख़वातीन” और “भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन” जैसे महिला संगठनों ने किस तरह से स्वयं द्वारा अनुमोदित इस्लामिक “विवाह अनुबंध” (निकाहनामा) प्रस्तुत करके परिवार और विवाह के भीतर महिलाओं के अधिकारों और जिम्मेदारियों के पित्तृसत्तात्मक विचारों को पुन:परिभाषित करने का प्रयास किया गया। इन संगठनों द्वारा धार्मिक रूढ़िवादी संस्थानों द्वारा अनुमोदित पुरुष-प्रधान निकाहनामा के संस्करण का विरोध किया गया है। इस संबंध में दाम्पत्य संबंधों की अलग-अलग व्याख्याएं शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में नहीं करती जो कि सामाजिक-कानूनी क्षेत्र के भीतर और मुस्लिम महिलाओं की सक्रियता में संघर्ष और तनाव पैदा करती हैं। लेखिका महिला अनुकूल निकाहनामा पर अपने विश्लेषण के द्वारा कानूनी व्यवस्था के भीतर इस्लाम में लैंगिक न्याय पर विमर्श को राजनीतिक और वैचारिक रूप से खंडित करने का भरसक प्रयास करती नज़र आती हैं। लैंगिकता उन्मुख यह निकाहनामें “दाम्पत्य संबंधों” के विमर्श में बदलाव का प्रतीक है जिसका धार्मिक तालमेल से दूर न्यायिकता की ओर झुकाव है। दोनों निकाहनामा इस तथ्य का उदहारण देते हैं कि यह लैंगिक न्याय के धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष दोनों ही दृष्टिकोण को समाहित करता हैं। महिलाओं अधिकारों और इस्लाम पर स्थानीय विमर्श को विलय कर नवीन निर्मित किए गए कानूनी स्थानों के भीतर नए प्रकार के कानूनों का निर्माण कर रहे हैं।


अध्याय पाँच 'लीगल रिएलिटीज : डूइंग जेंडर जस्टिस फ्रॉम बेलो' में लेखिका विभिन्न अंतर्दृष्टि के माध्यम से जमीनी स्तर पर न्याय की समझ को उजागर करती हैं कि किस तरह से महिला कार्यकर्त्ता, वादी, चार अलग-अलग कानूनी संस्थान जिसमें पारिवारिक न्यायालय, दारुल कज़ा के न्यायधीश, बज़्मे ख़वातीन और ऑल इंडिया मुस्लिम वूमेन्स पर्सनल लॉ बोर्ड ‘लैंगिक न्याय’ को परिभाषित और व्यक्त करते है। लेखिका टिप्पणी करते हुए कहती है कि पारिवारिक अदालतों का विशेष रूप से गरीब महिलाओं की पीड़ा के प्रति उदासीनता के कारण कुछ मुस्लिम महिलाएं वैवाहिक विवादों के निपटारे के लिए दारुल कज़ा के सामुदायिक प्राधिकरण की ओर रुख करती हैं। जबकि व्यवहार में दारुल कज़ा में किए गए फैसलों का कोई कानूनी आधार नहीं है। इस तरह के मंच महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के बजाय पितृसत्तात्मक मूल्यों को बनाये रखने में अधिक चिंतित हैं। लेखिका इस तरह के रूढ़िवादी संस्थानों के अलोकतांत्रिक और लैंगिक पक्षपाती व्याख्यायों का खंडन करती हैं। जबकि “ऑल इंडिया मुस्लिम वूमेन्स पर्सनल लॉ बोर्ड” और “बज़्मे ख़्वातीन” शोषित व पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय प्राप्ति के ऐसे स्थान को निर्मित करती हैं, जो पारिवारिक मामलों में समान वैवाहिक अधिकारों की वकालत करते हैं।


उपसंहार के रूप में अध्याय छ: 'मुस्लिम वूमेन्स कुएस्ट फॉर जस्टिस : थ्योरेटिकल इम्प्लीकेशन्स एण्ड पॉलिसी सजैसेंस' कई नीति-प्रासंगिक सुझावों को प्रस्तुत करता है। जो महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक न्याय के प्रति संवेदनशील और संदर्भ-जागरूक दृष्टिकोण के लिए उपयोगी रणनीति और हस्तक्षेप तंत्र विकसित करने में कानूनी विद्वानों, नीति-निर्माताओं और कार्यकर्त्ताओं के लिए ये मददगार हो सकते हैं। अपने सुझावों में वह कानूनी बहुलता को उजागर करती हुई कहती है कि कानूनी विद्वानों, अधिवक्ताओं, नीति-निर्धारकों, महिला अधिकारों और मानवाधिकारों के कार्य में लगे लोगों को विवाह, परिवार, समुदाय और राष्ट्र-राज्यों के बीच संबंध को आकार देने वाली वास्तविकताओं की बहुलता को समझने की जरूरत है। उत्तर-औपनिवेशिक राज्य सामुदायिक अदालतों और स्थानीय प्राधिकारियों के साथ किस तरह से अपनी अधिनिर्णयन शक्ति को साझा करते हैं। यह जानने के लिए राज्य और गैर-राज्य कानूनी संस्थानों के द्विविभाजन को समझना अनिवार्य है। व्यक्तियों के रोज़मर्रा के अनुभवों और कानून की अपेक्षाओं से जुड़े होने पर लैंगिक सुधार अधिक सार्थक होता है। लेखिका कहती है कि कानूनी रूप से बहुलवादी समाजों में अनौपचारिक कानूनी प्राधिकारियों और प्रतिनिधियों के साथ एक अंतर-कानूनी और अंतर-न्यायिक संवाद स्थापित करने के लिए कानूनी विद्वानों, विकास एजेंसियों और नीति-निर्माताओं की आवश्यकता है। यह पुस्तक इस आकांशा को पूरा करने में प्रत्यक्ष रूप से योगदान देती है।


वर्तमान में दक्षिण एशिया ऐसा क्षेत्र है जहाँ मुस्लिम महिलाओं की सक्रियता बढ़ रही है। मुस्लिम महिला संगठन और नेटवर्क दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों में ज्यादा सक्रिय हैं। इस तरह के कार्यकर्त्ता तमिलनाडु के ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाए गए हैं। इसलिए इस अध्ययन में शामिल कार्यकर्त्ता अद्वितीय नहीं हैं। लेखिका को लैंगिक न्याय प्राप्ति के इस्लामिक ढांचे से परे जाकर देश में व्याप्त धर्मनिरपेक्ष कानूनों जैसे 'विशेष विवाह अधिनियम (1954)' के आलोक में भी पुस्तक में चर्चा करनी चाहिए। नीति-निर्माताओं और कानूनी अधिवक्ताओं को यह जानना होगा कि यघपि सामाजिक समानता के सार्वभौमिक सिद्धांत असंतुष्टों के लिए सबसे प्रभावी उपकरण हो सकते हैं, लेकिन ऐसी अवधारणाओं का कार्यान्वयन समस्याग्रस्त हो सकता। इसके बावजूद समकालीन भारत में मुस्लिम महिलाओं के बढ़ते प्रयास को प्रतिबिंबित करने में उनका योगदान सराहनीय है। लेखिका द्वारा प्रयुक्त सामग्री पुस्तक का सबल पक्ष है। महिला अधिकार कार्यकर्त्ताओं ने लैंगिकता और न्याय की पितृसत्तात्मक धारणा में परिवर्तन लाकर इस्लाम में महिलाओं की अधीनता पर वैकल्पिक विमर्श का उद्भव भी किया है। इन सक्रीय महिलाओं ने निष्पक्ष मानदंडों और पारिवारिक कानून की व्याख्या करने के लिए अधिनिर्णयन के कई दृष्टिकोण विकसित किए। विश्लेषण की दृष्टि से यह पुस्तक दुनियाभर के नीति निर्माताओं, कानूनी अधिवक्ताओं, शोधार्थियों, मानवाधिकार और महिला अधिकार समूहों के लिए ज्ञानवर्धक, मार्गदर्शक और प्रासंगिक साबित हो सकती है।


(Author is an Intern with Academics4Nation and a Research Scholar in Universty of Delhi.)


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