अमेरिका और चाइना के मध्य ट्रेड-वार: भारतीय दृष्टिकोण

अमेरिका का यह प्रयास है की जिन वस्तुओं की मांग वैश्विक स्तर पर ज्यादा है उनका उत्पादन वह स्वयं करे, दूसरी तरफ, चाइना पुरे विश्व के व्यापारिक बाजार पर अपना वर्चस्व काबिज स्थापित करना चाहता है



अमित कुमार


वैश्विक स्तर पर जब दो देशों के मध्य व्यापार को लेकर व्यापक स्तर पर मतभेद निरंतर उभरने प्रारंभ हो जाए, तो इस घटना को ट्रेड-वार यानि व्यापार युद्ध की संज्ञा दी जाती है| हाल के वर्षों मे, विश्व के दो सबसे ताकतवर देश अमेरिका और चीन के मध्य व्यापार को निरतंर लेकर होने वाले तर्क-वितर्क और वाद-विवाद की घटना को इसी प्रकार के व्यापार युद्ध की अवधारणा के तहत देखा जा रहा है, जिसके तहत ये दोनों देश एक-दुसरे के समक्ष प्रतिद्वंदी बनकर खड़े हैं| जहां अमेरिका का यह प्रयास है की जिन वस्तुओं की मांग वैश्विक स्तर पर ज्यादा है उनका उत्पादन वह स्वयं करे, ताकि उसके घरेलू बाजार मे व्यापार मे कारोबारी घाटा कम और नौकरियों के अवसरों मे भी वृद्धि हो सके| दूसरी तरफ, चाइना आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस की तकनीकी के सहारे पुरे विश्व के व्यापारिक बाजार पर अपना वर्चस्व काबिज स्थापित करना चाहता है| इसी को देखते हुए चाइना ने “मेड इन चाइना 2025” नामक योजना की रूपरेखा भी तैयार की है जिससे दोनों देशों के मध्य व्यापार को लेकर तनातनी और अधिक बढ़ गई| इसी राह पर चलते हुए अमेरिका ने स्टील, एल्यूमिनियम पर ड्यूटी बढ़ाते हुए और कई उत्पादनों पर शुल्क बढ़ाने की चेतावनी दी| दूसरी तरफ, चाइना ने अमेरिका से आने वाले सोयाबीन सहित कृषि उत्पादों पर ड्यूटी लगा दी| उसके पश्चात 6 जुलाई 2018 को अमेरिका ने चीन से आयात होने वाली वस्तुओं पर 60 अरब डॉलर के हिसाब से 25% की ड्यूटी लगाई तो वहीँ चीन ने 130 अमेरिकी उत्पादों पर 3 बिलियन ड्यूटी लगाने की घोषणा कर दी| 2019 में ये तनाव और बढ़ा और अमेरिका ने चीन की दिग्गज कम्पनी ‘हुआवे’ पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा दिया| इसके साथ ही, कुल मिलकर दोनों देशो के बिच 5700 श्रेणियों के उत्पादों के आयात निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ा है| इस लेख का मुख्य उद्देश्य इन दोनों देशों के मध्य चल रहे ट्रेड-वार का विश्लेषण भारत के संदर्भ मे करना है|


इन दोनों देशो के बिच चल रहे ट्रेड-वार का प्रभाव पुरे विश्व पर साफ तौर पर देख रहा है| अगर भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो इसके भारत पर नकारात्मक तथा सकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़े है| वर्तमान समय में चीन तथा अमेरिका के बिच चल रहे ट्रेड-वार और कोविड-19 के कारण उपजी अनिश्चितता को देखते हुए जापान तथा अमेरिका की बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ भारत की केंद्र तथा राज्य सरकारों के साथ निरंतर सम्पर्क में हैं, क्योंकि वो चीन से निकलकर भारत के बाजार में निवेश करना चाहती हैं| भारतीय सरकार ने 1000 कम्पनियों में से 300 कम्पनियों को लक्षित भी किया है| वहीं हाल ही में, विश्व की प्रख्यात मोबाइल कम्पनी एप्पल तथा सैमसंग ने भारत में निवेश की रूचि दिखाई है| इन कम्पनियों द्वारा भारत में मोबाईल फोन फैक्ट्री लगाने के लिए कुल 1.5 अरब डॉलर के निवेश की जाने की उम्मीद है| साथ ही, फॉक्सकॉन, विस्ट्रॉन कॉर्प और पेगाट्रॉन जैसी कम्पनियां भी निवेश के लिए तैयार हैं| ये कम्पनियां कोविड-19 के प्रकोप के बीच सक्रिय रूप से अपनी आपूर्ति व्यवस्था में विविधता के लिए ही भारत से सम्पर्क में हैं| वही मोबाईल उपकरण बनाने वाली घरेलू कम्पनी लावा इंटरनेशनल चीन से अपने कारोबार को भारत में ला रही है| कम्पनी ने मोबाइल फोन डेवलपमेंट तथा मैन्युफैक्चरिंग को बढाने के लिए पांच साल में 800 करोड़ रूपये के निवेश की योजना बनाई है| वह अपना सारा निर्यात अब भारत से ही करेगी| अमेरिकी कंपनियों की अगर बात करें तो अब तक भारत में 17 अरब डॉलर यानी करीब 1.27 लाख करोड़ रुपये का निवेश की जाने बात कही गई है, जिसमें मुख्य रूप से ई-कामर्स कम्पनी अमेजन ने 7400 करोड़ रूपये, फेसबुक ने 44 हजार करोड़ रूपये तथा गूगल ने हाल ही में 75 हजार करोड़ रूपये के निवेश की घोषणा की है| इसी गति से यदि विदेशी निवेश की दर भारत मे बढ़ती रही तो यह न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि साथ ही इससे भारतीय युवाओं के लिए रोजगार के अनेकों अवसरों का जन्म होगा|


अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, भारत का चीन के साथ लगभग 10 साल से व्यापार खाता घाटा चला आ रहा है, क्योंकी चीन की अपेक्षा भारत ज्यादा मात्रा में वहाँ से वस्तुओं का निर्यात करता है| परंतु हाल ही में, चीन तथा अमेरिका के मध्य चल रहे ट्रेड-वार के फलस्वरूप चीन ने जरूरी उत्पादों के निर्यात के लिए अमेरिका के बजाय भारत के तरफ रुख किया है| वर्तमान समय में भारत ने चीन के साथ अपने चालू व्यापार खाता घाटा (ट्रेड डेफिसिट) को कम कर लिया है, जो की लगभग एक दशक के बाद हुआ है| 31 मार्च 2020 को खत्म हुए वित्त वर्ष में भारत का चीन को एक्सपोर्ट 31% वृद्धि के साथ 17 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है| हालाँकि अभी भी भारत और चीन के मध्य लगभग 53 बिलियन डॉलर चालू खाता घाटा (ट्रेड डेफिसिट) है|


रोजगार अवसरों के संदर्भ में, जो विदेशी कम्पनियाँ भारत में निवेश की बात कर रही है अगर वह सभी निवेश करती है तो निश्चित ही युवाओं के लिए लाखों रोजगार के अवसरों का निर्माण होगा| उदारहण के तौर पर, अमेजन ने 10 लाख रोजगार अवसरों के सर्जन की बात अगले 5 वर्षों में कही है और ये रोजगार निवेश के पश्चात् तकनीकी, बुनियादी ढांचे और लोजिस्टिक नेटवर्क में भारत के युवाओं को मिलेगा| साथ ही, साऊथ कोरिया की इलेक्ट्रोनिक कम्पनी एडिसन मोटर्स ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी मुलाकात करके 5 हजार करोड़ डॉलर के निवेश की बात की है और इस निवेश से सीधे तौर पर 5 हजार लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे| इसी क्रम में जर्मनी की फुटवियर कम्पनी वोन वेल्लक्स ने अपनी यूनिट चाइना से हटाकर आगरा में शिफ्ट करने का एलान किया है जिससे 10 हजार नए रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे| 'सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी’ (सीएमआईई) के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार कोविड महामारी के दौरान भारत मे कुल 12 करोड़ नौकरियां चली गई हैं| कोविड संकट से पहले भारत में कुल रोजगार आबादी की संख्या 40.4 करोड़ थी, जो इस संकट के बाद घटकर 28.5 करोड़ हो चुकी है| कुल मिलाकर, ऐसे समय जब कोविड महामारी के कारणवश करोड़ों की नौकरियाँ जा रही है, उस दौर मे ट्रैड-वार के चलते भारत में आने वाले समय में अनेक रोजगार अवसरों के सर्जन की उम्मीद है जिसके फलस्वरूप न केवल भारतीय युवाओं को नौकरियाँ प्राप्त होंगी परंतु साथ ही में, देश की गरीबी दर मे भी कमी होगी|


देश मे विदेशी कम्पनियों के निवेश की बात करें तो इससे महिला सशक्तिकरण को भी मजबूती मिलेगी| उनके लिए भी रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे क्योंकी आमतौर पर विदेशी कम्पनियां ऑफिस से लेकर फिल्डवर्क तक में अपने उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए महिलाओं की मदद लेने से पीछे नहीं हटती है| दूसरी और, विदेशी निवेश को लेकर एक अन्य महत्वपूर्ण बात इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी हुई है, क्योंकि अगर भारत के प्रत्येक राज्य को अपने आर्थिक विकास को मजबूत करना है तो इसके लिए अपने यहाँ की आधारिक संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर पर विशेष ध्यान देना होगा| क्योंकी अभी तक दिल्ली, गुडगाँव, बेंगलुरु और मुंबई ही कुछ हद तक इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में और राज्यों से आगे हैं और अधिकतर विदेशी निवेश भी इन्ही व्यापारिक केंद्रों तक सीमित है| शायद इसी को ध्यान मे रखते हुए, भारतीय सरकार ने अपनी आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से साल 2030 तक इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 4.5 लाख करोड़ डॉलर खर्च करने की योजना ‘नेशनल इन्फ्रास्ट्क्चर पाइपलाइन’ नामक परियोजना के जरिये बनाई है, जिसके पूरे हो जाने पर कारोबार, व्यापार तथा रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे और सरकार के रेवेन्यु मे भारी वृद्धि देखने को मिलेगी तथा स्थानीय लोककल्याकारी परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में केंद्र और राज्य की दोनों सरकोरों को बल मिलेगा|


विदेशी निवेशों के भारत में आने के बाद भारत के समक्ष अवसर और चुनौतीयाँ दोनों एक साथ खड़ी हुई हैं, जिनका सामना भारत को एक-साथ करना है| व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व में सबसे अधिक विदेशी निवेश प्राप्त करने वाले शीर्ष दस देशों में शामिल है, परन्तु व्यापार संबंधित सख्त नियमों के कारण भारत में निवेश करने वाली विदेशी कम्पनियों की संख्या मे कमी भी आ सकती है, इसका सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव तकनीकी एवं इंटरनेट से जुडी कम्पनियों पर देखने को मिलेगा| भारत को नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए अमेरिका और चीन जैसे देशों के साथ वाणिज्यिक वार्ता को बढाने के साथ-साथ व्यापार संबंधित नियमों के संदर्भ मे लचीली एवं कुटनीतिक रुख भी अख्तियार करने की जरूरत है|


(Author is an Intern with Academics4Nation and a Research Scholar at Central University of Jharkhand)

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